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Thursday, March 5, 2026

ईरान-इजरायल युद्ध का असर: इटावा का 25–30 करोड़ का बासमती चावल बंदरगाह पर फंसा, निर्यातकों में चिंता

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इटावा: बासमती चावल निर्यात कारोबार पर अंतरराष्ट्रीय हालात का असर साफ दिखाई देने लगा है। ईरान और इजरायल के बीच जारी युद्ध के कारण जिले के निर्यातकों का लगभग 25 से 30 करोड़ रुपये का बासमती चावल गुजरात के गांधी धाम बंदरगाह पर फंसा हुआ है। जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने और भुगतान प्रक्रिया में देरी के कारण व्यापारियों को भारी आर्थिक नुकसान की आशंका सताने लगी है।

जनपद से हर साल बड़ी मात्रा में बासमती चावल ईरान और अन्य खाड़ी देशों को निर्यात किया जाता है। इस कारोबार का वार्षिक टर्नओवर करीब 300 करोड़ रुपये तक पहुंचता है, लेकिन वर्तमान अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के चलते यह पूरा व्यापार अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है। निर्यातकों का कहना है कि यदि हालात जल्द सामान्य नहीं हुए तो जिले के चावल उद्योग को भारी झटका लग सकता है।

चावल कारोबारियों के अनुसार जिले से भेजे गए कई कंटेनर बंदरगाहों पर खड़े हैं और उन्हें आगे भेजने की प्रक्रिया पूरी तरह प्रभावित हो गई है। युद्ध के चलते ईरान रूट पर जहाजों की आवाजाही बाधित हो गई है, जिससे शिपिंग लाइन पर भी असर पड़ा है। इसके चलते मुंद्रा और गांधी धाम बंदरगाह पर करोड़ों रुपये का बासमती चावल फंसा हुआ है और निर्यातकों का पैसा अटक गया है।

भरथना कस्बे के गगन राइस मिल के संचालक मोहल्ला नवीन निवासी रवि पोरवाल और प्रेमचंद पोरवाल ने बताया कि वे लंबे समय से बासमती चावल का निर्यात करते आ रहे हैं। उनके अनुसार वे हर वर्ष लगभग 80 से 100 करोड़ रुपये का चावल यमन, ओमान, सऊदी अरब समेत कई खाड़ी देशों को भेजते हैं। वर्तमान परिस्थितियों में उनके करीब 45 कंटेनर चावल बंदरगाहों पर अटके हुए हैं। युद्ध के कारण समुद्री मार्ग प्रभावित होने से माल भेजने की प्रक्रिया पूरी तरह ठप हो गई है।

उन्होंने बताया कि जिले से मुख्य रूप से बासमती चावल की किस्में 1121, 1509, 1718, सुगंध और ताज के साथ-साथ शरबती और पीआर किस्म का चावल भी निर्यात किया जाता है। इन किस्मों की खाड़ी देशों में काफी मांग रहती है और यही कारण है कि इटावा का बासमती चावल अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी अलग पहचान बना चुका है।

जिले में धान उत्पादन बड़े पैमाने पर होता है, इसलिए यहां के चावल कारोबार का बड़ा हिस्सा निर्यात पर निर्भर करता है। एक अनुमान के अनुसार हर साल करीब 25 हजार मीट्रिक टन बासमती चावल ईरान, यमन, ओमान, सऊदी अरब सहित अन्य खाड़ी देशों को समुद्री मार्ग से भेजा जाता है। युद्ध की स्थिति के कारण इस समय माल की आवाजाही पर व्यापक असर पड़ा है।

निर्यातकों का कहना है कि यदि युद्ध लंबा खिंचता है तो पूरे कारोबार पर गंभीर संकट खड़ा हो सकता है। इससे न केवल व्यापारियों बल्कि किसानों पर भी असर पड़ेगा, क्योंकि बासमती धान की बड़ी मात्रा निर्यात के लिए खरीदी जाती है।

व्यापारियों ने सरकार से मांग की है कि निर्यातकों के हितों को देखते हुए वैकल्पिक बाजार उपलब्ध कराए जाएं और निर्यात की सुरक्षित व्यवस्था सुनिश्चित की जाए, ताकि कारोबार को नुकसान से बचाया जा सके। फिलहाल जिले के चावल कारोबारी अंतरराष्ट्रीय हालात सामान्य होने का इंतजार कर रहे हैं।

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