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Wednesday, March 25, 2026

13 साल की दर्द भरी जंग खत्म: नम आंखों से हरीश राणा को दी गई अंतिम विदाई

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नई दिल्ली| ग्रीन पार्क इलाके में बुधवार को हरीश राणा को नम आंखों से अंतिम विदाई दी गई। लंबे समय तक कोमा में रहने और असहनीय पीड़ा झेलने के बाद उनका निधन हो गया। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में उपचार के दौरान उन्होंने अंतिम सांस ली। सुप्रीम कोर्ट द्वारा इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) की अनुमति मिलने के बाद उनके लाइफ सपोर्ट सिस्टम को चरणबद्ध तरीके से हटाया गया था।
अंतिम संस्कार के दौरान परिवार, रिश्तेदारों और स्थानीय लोगों की भारी भीड़ उमड़ी। हर किसी की आंखें नम थीं और माहौल बेहद भावुक हो गया। हरीश के माता-पिता, जिन्होंने वर्षों तक बेटे की जिंदगी के लिए संघर्ष किया, अंत में उसे सम्मानजनक मुक्ति दिलाने के फैसले के साथ खड़े नजर आए।
हरीश राणा की जिंदगी वर्ष 2013 में एक दर्दनाक हादसे के बाद पूरी तरह बदल गई थी। उस समय वह महज 19 वर्ष के थे और चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में सिविल इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष के छात्र थे। अगस्त 2013 में रक्षाबंधन के दिन बहन से फोन पर बात करते हुए वह अपने पीजी की चौथी मंजिल से गिर गए थे, जिससे उनके सिर में गंभीर चोट आई और वह कोमा में चले गए।
इसके बाद से हरीश करीब 13 वर्षों तक स्थायी वनस्पति अवस्था (परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट) में रहे। वह न बोल सकते थे, न हिल-डुल सकते थे, केवल मशीनों के सहारे उनकी सांसें चल रही थीं। परिवार ने इस दौरान हर संभव इलाज कराया, कई अस्पतालों के चक्कर लगाए और डॉक्टरों से लेकर अदालत तक उम्मीद की हर डोर थामे रखी, लेकिन उनकी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ।
अंततः बेटे की असहनीय पीड़ा को देखते हुए परिवार ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। पहले मामला दिल्ली उच्च न्यायालय पहुंचा, जहां वर्ष 2024 में याचिका खारिज कर दी गई। इसके बाद परिवार सुप्रीम कोर्ट गया, जहां 11 मार्च 2026 को इच्छामृत्यु की अनुमति दे दी गई।
हरीश को 14 मार्च 2026 को एम्स में भर्ती कराया गया था। डॉक्टरों की टीम ने कानूनी प्रक्रिया के तहत धीरे-धीरे उनके लाइफ सपोर्ट सिस्टम को हटाना शुरू किया। अंतिम दिनों में उन्हें खाना-पानी भी नहीं दिया जा रहा था और केवल दर्द से राहत देने वाली दवाएं दी जा रही थीं, ताकि उन्हें कम से कम कष्ट हो।
24 मार्च 2026 को हरीश राणा ने आखिरकार इस दुनिया को अलविदा कह दिया। उनकी मौत ने एक बार फिर इच्छामृत्यु जैसे संवेदनशील विषय पर समाज में बहस छेड़ दी है। यह मामला न केवल कानूनी बल्कि मानवीय दृष्टिकोण से भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जहां एक परिवार ने अपने बेटे को पीड़ा से मुक्ति दिलाने के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी।
समयरेखा (मुख्य घटनाएं):
20 अगस्त 2013: चौथी मंजिल से गिरकर गंभीर रूप से घायल
वर्ष 2022: माता-पिता ने दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की
8 जुलाई 2024: हाई कोर्ट ने याचिका खारिज की
15 जनवरी 2026: सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा
11 मार्च 2026: सुप्रीम कोर्ट ने इच्छामृत्यु की अनुमति दी
14 मार्च 2026: एम्स में भर्ती
24 मार्च 2026: निधन
यह घटना एक दर्दनाक लेकिन मानवीय संघर्ष की कहानी बन गई है, जिसने समाज को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि जीवन और मृत्यु के बीच गरिमा का स्थान कितना महत्वपूर्ण है।

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