उत्तर प्रदेश के हाथरस में पत्रकार वेदप्रकाश उर्फ सोनू की हत्या ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि हमारे सिस्टम में “खतरे की सूचना” अब केवल कागजी औपचारिकता बनकर रह गई है। जब एक व्यक्ति—वह भी एक पत्रकार—अपनी जान को खतरा बताते हुए पुलिस के पास जाता है और फिर भी उसकी हत्या हो जाती है, तो यह केवल अपराध नहीं, बल्कि प्रशासनिक विफलता का स्पष्ट उदाहरण है।
इस पूरे प्रकरण में सबसे गंभीर तथ्य यह है कि मृतक ने पहले ही पुलिस को अपनी सुरक्षा को लेकर चेताया था। यानी प्रशासन के पास समय था, अवसर था, और जिम्मेदारी भी थी। लेकिन इन तीनों का सही उपयोग नहीं हुआ। परिणामस्वरूप, अपराधियों के हौसले बढ़े और एक हत्या हो गई।
यह सवाल अब टाला नहीं जा सकता कि क्या पुलिस ने शिकायत को गंभीरता से लिया? यदि लिया, तो सुरक्षा के क्या कदम उठाए गए? और यदि नहीं लिया, तो क्यों? यह केवल प्रक्रियागत चूक नहीं, बल्कि जवाबदेही का विषय है।
मकान विवाद को इस घटना की जड़ बताया जा रहा है, जो पिछले दो वर्षों से चला आ रहा था। ऐसे मामलों में स्थानीय प्रशासन की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। विवाद को सुलझाने, पक्षों पर नजर रखने और संभावित हिंसा को रोकने की जिम्मेदारी प्रशासन की होती है। लेकिन यहां यह जिम्मेदारी निभाई जाती नहीं दिखी।
और यहीं से यह मामला एक व्यक्ति की हत्या से आगे बढ़कर एक व्यापक चिंता का विषय बन जाता है—पत्रकारों की सुरक्षा।
पत्रकार लोकतंत्र के चौथे स्तंभ माने जाते हैं, लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि वही सबसे ज्यादा असुरक्षित होते जा रहे हैं। जो लोग सच सामने लाते हैं, वही सबसे पहले निशाने पर आते हैं। और जब उन्हें सुरक्षा देने वाला सिस्टम ही उदासीन हो जाए, तो यह स्थिति और भी खतरनाक हो जाती है।
हाथरस की घटना कोई अलग-थलग मामला नहीं है। प्रदेश में पहले भी ऐसे उदाहरण सामने आ चुके हैं, जहां खतरे की आशंका के बावजूद समय रहते कार्रवाई नहीं हुई और गंभीर परिणाम सामने आए। यह एक पैटर्न बनता जा रहा है—पहले शिकायत, फिर अनदेखी, और अंत में घटना।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज्यादा जरूरी है जवाबदेही तय करना। केवल आरोपियों की गिरफ्तारी पर्याप्त नहीं है। उन अधिकारियों की भी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए, जिन्होंने शिकायत को नजरअंदाज किया। जब तक सिस्टम के भीतर जवाबदेही सुनिश्चित नहीं होगी, तब तक ऐसी घटनाएं दोहराई जाती रहेंगी।
साथ ही, यह समय है कि पत्रकारों की सुरक्षा के लिए एक स्पष्ट और प्रभावी नीति बनाई जाए। खतरे के आकलन की पारदर्शी प्रक्रिया हो, समयबद्ध कार्रवाई सुनिश्चित की जाए और किसी भी शिकायत को हल्के में न लिया जाए।
हाथरस की यह घटना एक चेतावनी है—और चेतावनियां हमेशा समय रहते समझने के लिए होती हैं। यदि अब भी सिस्टम नहीं चेता, तो यह मान लेना चाहिए कि समस्या केवल अपराध की नहीं, बल्कि उस सोच की है, जो खतरे को तब तक खतरा नहीं मानती जब तक वह एक मौत में न बदल जाए।
क्योंकि अंततः सवाल यही है—
क्या उत्तर प्रदेश में अब चेतावनी देने का भी कोई मतलब बचा है?
चेतावनी की अनदेखी और एक मौत: यूपी में पत्रकारों की सुरक्षा पर बड़ा सवाल


