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Friday, April 10, 2026

मानवाधिकार आयोग का सख्त रुख: लिपिक आत्महत्या मामले में पालिकाध्यक्ष के अधिकार समाप्त करने के आदेश

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इटावा

जनपद में नगर पालिका परिषद के वरिष्ठ लिपिक की आत्महत्या के मामले ने तूल पकड़ लिया है। उत्तर प्रदेश राज्य मानवाधिकार आयोग ने इस संवेदनशील प्रकरण में कड़ा रुख अपनाते हुए पालिकाध्यक्ष के प्रशासनिक और वित्तीय अधिकार समाप्त करने के निर्देश जारी किए हैं। आयोग ने यह कार्रवाई मृतक आश्रित को नौकरी न देने और बकाया भुगतान में लगातार लापरवाही बरतने के चलते की है।

गौरतलब है कि बीते जून माह में नगर पालिका परिषद में कार्यरत वरिष्ठ लिपिक राजीव यादव ने पालिका अध्यक्ष और अधिशासी अधिकारी पर प्रताड़ना का आरोप लगाते हुए आत्महत्या कर ली थी। इस घटना के बाद से ही मामला लगातार सुर्खियों में बना हुआ है। मृतक के पुत्र सिद्धार्थ यादव ने न्याय की गुहार लगाते हुए मानवाधिकार आयोग का दरवाजा खटखटाया था।

आयोग में दी गई शिकायत में बताया गया कि राजीव यादव की मृत्यु के बाद परिवार को न तो कोई आर्थिक सहायता दी गई और न ही मृतक आश्रित के रूप में नौकरी प्रदान की गई। जबकि नियमों के तहत परिवार को तत्काल राहत मिलनी चाहिए थी। इस पर आयोग ने सिटी मजिस्ट्रेट से जांच कराई, जिसमें राजीव यादव की नौकरी को वैध पाया गया और सात दिन के भीतर सभी बकाया देयकों के भुगतान के आदेश दिए गए।

इसके बावजूद पालिका प्रशासन द्वारा आयोग के निर्देशों का पालन नहीं किया गया। इसे गंभीर लापरवाही मानते हुए आयोग ने सात अप्रैल को कड़ा कदम उठाया और जिलाधिकारी को निर्देश दिया कि पालिकाध्यक्ष के प्रशासनिक और वित्तीय अधिकार तत्काल प्रभाव से समाप्त किए जाएं। साथ ही आयोग ने मृतक के पुत्र को आश्रित कोटे में नियुक्ति देने और सभी लंबित देयकों का भुगतान सुनिश्चित कराने के भी आदेश दिए हैं।

जिलाधिकारी शुभ्रांत कुमार शुक्ल ने बताया कि इस पूरे मामले की विस्तृत रिपोर्ट शासन को भेजी जाएगी और शासन से आदेश प्राप्त होने के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी। वहीं आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि इस प्रकरण की पूरी रिपोर्ट जल्द से जल्द प्रस्तुत की जाए, ताकि मामले में पारदर्शिता बनी रहे।

मृतक की पत्नी नीतू यादव ने भी आयोग में शिकायत दर्ज कराते हुए आरोप लगाया था कि उनके पति की मृत्यु के बाद पालिका प्रशासन ने जानबूझकर मामले को लटकाए रखा और परिवार को किसी प्रकार की सहायता नहीं दी गई। इस कारण परिवार को आर्थिक और मानसिक दोनों तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।

मानवाधिकार आयोग की इस सख्त कार्रवाई को प्रशासनिक लापरवाही के खिलाफ एक बड़ा संदेश माना जा रहा है। अब यह देखना अहम होगा कि शासन स्तर से क्या निर्णय लिया जाता है और पीड़ित परिवार को कब तक न्याय और राहत मिल पाती है।

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