वाराणसी। धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं के लिए विश्वविख्यात काशी में इस वर्ष होली से पहले ‘चिता भस्म की होली’ को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। श्मशान घाटों पर खेली जाने वाली इस परंपरा को लेकर डोमराजा परिवार ने कड़ा ऐतराज जताते हुए इसे तत्काल प्रभाव से बंद कराने की मांग की है। परिवार ने चेतावनी दी है कि यदि मसान घाट पर चिता भस्म की होली खेली गई तो वे विरोध स्वरूप चिता में आग देना बंद कर देंगे।
काशी के मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट पर वर्षों से कुछ साधु-संतों और श्रद्धालुओं द्वारा चिता की राख से होली खेलने की परंपरा रही है। इसे शिवभक्ति और वैराग्य की प्रतीक परंपरा बताया जाता है। हालांकि इस बार मणिकर्णिका घाट से जुड़े डोमराजा परिवार ने इसे मृतकों का अपमान बताते हुए आपत्ति दर्ज कराई है। उनका कहना है कि चिता की भस्म से रंग खेलना समाज में गलत संदेश देता है और शोक संतप्त परिवारों की भावनाओं को आहत करता है।
डोमराजा परिवार का कहना है कि यदि भारी भीड़ घाट पर पहुंचती है और चिता भस्म से होली खेली जाती है तो यह प्रशासन की लापरवाही मानी जाएगी। ऐसी स्थिति में वे चिता को मुखाग्नि देना बंद कर अपना विरोध दर्ज कराएंगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि इसके लिए पूरी जिम्मेदारी प्रशासन की होगी।
काशी में अंतिम संस्कार की परंपरा में डोम समुदाय की विशेष भूमिका रही है। मान्यता है कि मणिकर्णिका घाट पर सदियों से डोमराजा परिवार द्वारा ही चिता को अग्नि दी जाती है। इस बार उनका विरोध सामने आने से धार्मिक संगठनों, साधु-संतों और प्रशासन के बीच चर्चा तेज हो गई है।
स्थानीय प्रशासन ने मामले को गंभीरता से लेते हुए शांति व्यवस्था बनाए रखने की अपील की है। अधिकारियों का कहना है कि सभी पक्षों से संवाद कर समाधान निकालने का प्रयास किया जाएगा ताकि धार्मिक आस्था और सामाजिक संवेदनशीलता के बीच संतुलन बना रहे।
फिलहाल काशी में होली के पारंपरिक आयोजनों को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है। देखना होगा कि प्रशासन और संबंधित पक्षों के बीच बातचीत से क्या रास्ता निकलता है और इस वर्ष मसान की होली किस रूप में आयोजित होती है।






