-सुनील कुमार महला
हमारी सनातन भारतीय संस्कृति और हिन्दू धर्म का एक पावन-पवित्र और प्रमुख पर्व है-‘नवरात्रि।’ यह पर्व देवी शक्ति विशेष रूप से मां दुर्गा की आराधना को समर्पित है। इस पर्व में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है और यह आत्मशुद्धि, श्रद्धा तथा आंतरिक शक्ति के जागरण का प्रतीक पर्व माना जाता है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नवरात्रि का आरंभ होता है, जो प्रकृति में नवचेतना, नव-उत्साह, नव-उमंग, नव-ऊर्जा तथा नव-उत्कर्ष का समय होता है। इसी दिन से हिंदू नववर्ष (नवसंवत्सर) का भी प्रारंभ होता है, जिसे सृष्टि का आरंभ माना जाता है। वास्तव में, यह पावन पर्व हमें नए संकल्प, सकारात्मकता तथा धर्ममय जीवन जीने की प्रेरणा देता है।
‘शक्ति’ का अर्थ: सृजन ऊर्जा:-
यहां पाठकों को बताता चलूं कि ‘शक्ति’ का अर्थ केवल और केवल शारीरिक बल से नहीं है, बल्कि ‘शक्ति’ वह दिव्य ऊर्जा है, जो इस समस्त सृष्टि का संचालन करती है और इसी शक्ति को ‘मां दुर्गा’ के रूप में पूजित किया जाता है। यह शक्ति सृजन, पालन और संहार का आधार मानी जाती है तथा प्रत्येक जीव के भीतर चेतना, साहस, धैर्य और कर्म की प्रेरणा जगाती है। नवरात्र के नौ दिनों में मां दुर्गा के विभिन्न रूपों-शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री की उपासना की जाती है, जो जीवन के विविध गुणों जैसे ज्ञान, तप, करुणा और वीरता का प्रतीक हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो ‘शक्ति’ अज्ञान पर ज्ञान की विजय, भय पर साहस की जीत और असत्य पर सत्य की स्थापना का प्रतीक है, इसलिए नवरात्र केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि आंतरिक नकारात्मकता को समाप्त कर आत्मिक शक्ति के जागरण का पावन अवसर भी है। दूसरे शब्दों में कहें तो ‘शक्ति’ अपनी शारीरिक और आंतरिक ऊर्जा को प्रचंड (उच्चतम स्तर) करना है। यह जीवन की हर परिस्थिति में आनंदमय रहने, मानसिक एकाग्रता और पूर्ण समर्पण के साथ कर्म करने की क्षमता है। कहना ग़लत नहीं होगा कि ‘शक्ति’ दूसरों पर नियंत्रण नहीं है, बल्कि यह तो एक प्रकार से स्वयं के भीतर की जागरूकता, प्रेम और ध्यान है। वास्तव में, सच्ची शक्ति अहंकार के मिट जाने पर प्रकट होती है, जो मनुष्य को निर्भय और सृजनात्मक बनाती है। यह भीतर बहने वाली वह सृजन-ऊर्जा (एनर्जी) है, जिसे ध्यान के द्वारा केंद्रित कर रूपांतरित किया जा सकता है।ध्यान का अर्थ है स्वयं को विचारों और वासनाओं से खाली करना, जिससे भीतर का बीज (शक्ति) अंकुरित हो सके। ‘शक्ति’ आंतरिक ऊर्जा ही तो है।शक्ति का अर्थ बाहरी पद या धन नहीं, बल्कि शरीर और मन से परे आत्मा की अपनी, स्वतंत्र ऊर्जा है। प्रेम ही शक्ति है। विनम्रता मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति है। बहरहाल, ‘नवरात्र’ का शाब्दिक अर्थ ‘नौ रातें’ होता है और इन नौ दिनों में श्रद्धालु व्रत, पूजा, साधना और उपासना करते हैं।पाठक जानते हैं कि वर्ष में मुख्यतः दो बार नवरात्रि मनाई जाती है-चैत्र नवरात्रि (मार्च–अप्रैल) और शारदीय नवरात्रि (सितंबर–अक्टूबर)। वास्तव में, नवरात्रि का मूल संदेश असत्य पर सत्य की विजय, अधर्म पर धर्म की स्थापना और अज्ञान पर ज्ञान का प्रकाश है।
इस नवरात्रि ‘मां दुर्गा’ का आगमन पालकी पर तथा विदाई हाथी पर:-
इस साल यानी कि वर्ष 2026 में चैत्र नवरात्रि 19 मार्च, गुरुवार से प्रारंभ होकर 27 मार्च तक रहेगी। प्रथम दिन प्रातः स्नान के बाद व्रत का संकल्प लिया जाता है, गंगाजल से स्थान को शुद्ध कर वेदी तैयार की जाती है, लाल वस्त्र बिछाकर प्रथम पूज्य श्री गणेशजी का ध्यान करते हुए कलश स्थापना की जाती है और ‘ॐ अपवित्रः पवित्रो वा…’ मंत्र का जप कर स्वयं को शुद्ध किया जाता है, तत्पश्चात अक्षत, पुष्प और जल लेकर देश, काल और गोत्र का उच्चारण करते हुए दुर्गा पूजन का संकल्प लिया जाता है। यह नवरात्रि नौ दिनों की उपासना के पश्चात रामनवमी पर समाप्त होती है, जबकि शारदीय नवरात्रि आश्विन शुक्ल पक्ष में मनाई जाती है और विजयदशमी से एक दिन पूर्व समाप्त होती है। इस वर्ष नवरात्रि का आरंभ गुरुवार को होने के कारण मान्यता है कि मां दुर्गा का आगमन पालकी पर होगा, जिसे अशुभ संकेत माना जाता है और इससे महामारी या प्राकृतिक आपदाओं की आशंका जोड़ी जाती है, वहीं उनकी विदाई हाथी पर होगी, जो अच्छी वर्षा, सुख-समृद्धि और ज्ञानवृद्धि का प्रतीक मानी जाती है। देवी भागवत के अनुसार यदि नवरात्र रविवार या सोमवार को आरंभ हों तो देवी का आगमन हाथी पर (अत्यंत शुभ), शनिवार या मंगलवार को घोड़े पर (अशांति या संघर्ष का संकेत) तथा बुधवार को नाव पर (अच्छी वर्षा का संकेत) माना जाता है। इसी प्रकार विदाई के दिन के अनुसार भी फल बताए गए हैं। मसलन, रविवार या सोमवार को भैंसे पर विदाई रोग और शोक का संकेत, शनिवार या मंगलवार को मुर्गे पर कष्टों की वृद्धि का संकेत, बुधवार या शुक्रवार को हाथी पर विदाई सुख-समृद्धि का प्रतीक तथा गुरुवार को मनुष्य पर विदाई देश में शांति और समृद्धि का सूचक मानी जाती है। कहना ग़लत नहीं होगा कि नवरात्रि का यह पर्व प्रकृति के संतुलन का भी द्योतक है, क्योंकि यह उस समय आता है जब दिन और रात लगभग बराबर होते हैं, जिसे ‘संपात काल’ कहा जाता है, और यह हमें जीवन में संतुलन बनाए रखने की प्रेरणा देता है। दार्शनिक रूप से यह दर्शाता है कि समस्त ऊर्जा का मूल स्रोत आदिशक्ति है, जो विभिन्न रूपों में प्रकट होकर कभी बुराई का नाश करती है तो कभी स्नेहमयी मां के रूप में सृजन और संरक्षण करती है। नवरात्रि में व्रत और पूजा का उद्देश्य आत्मसंयम, आंतरिक शुद्धता और ऊर्जा का संरक्षण करना है। पूजा के दौरान पंचतत्वों-गंध (पृथ्वी), पुष्प (आकाश), धूप (वायु), दीप (अग्नि) और नैवेद्य (जल) आदि को अर्पित कर संपूर्ण सृष्टि को मां के चरणों में समर्पित करने का भाव व्यक्त किया जाता है, साथ ही भजन-कीर्तन के माध्यम से मन का अर्पण भी किया जाता है। अंत में यही कहूंगा कि यह पर्व हमें सिखाता है कि सच्ची भक्ति दिखावे में नहीं, बल्कि सादगी, श्रद्धा और निष्कपट भाव में निहित होती है। मां दुर्गा सभी के प्रति समान भाव रखती हैं-अत्याचारियों के लिए कठोर और पीड़ितों के लिए करुणामयी।
अंततः नवरात्रि हमें सादगी, संतुलन और समर्पण के साथ जीवन जीने की प्रेरणा देती है, जिससे संसार में शांति, सुख और मंगल की स्थापना संभव हो सके। हमें यह बात अपने जेहन में रखनी चाहिए कि शक्ति की उपासना का वास्तविक फल तभी मिलता है जब हम अपने आचरण में पवित्रता और दूसरों के प्रति करुणा लाएं।नौ दिनों के उपवास, नियम और संयम का निष्कर्ष इंद्रिय नियंत्रण है। यह समय हमें अपने भीतर के ‘काम, क्रोध, लोभ और अहंकार’ जैसे असुरों को पहचानने और उन्हें समाप्त करने की प्रेरणा देता है।इस प्रकार से नवरात्रि आत्म-शुद्धि और अनुशासन का पर्व है। वास्तव में,सृजन और संहार दोनों के लिए स्त्री शक्ति अनिवार्य है। कन्या पूजन(कंजिका पूजन) के माध्यम से हम समाज में बालिकाओं और महिलाओं के प्रति सम्मान और सुरक्षा का संकल्प लेते हैं। सच तो यह है कि नवरात्रि का मुख्य संदेश ‘विजय’ है। जिस प्रकार माँ दुर्गा ने महिषासुर का वध किया और भगवान राम ने रावण पर विजय प्राप्त की, यह पर्व हमें सिखाता है कि सत्य और धर्म की राह कठिन हो सकती है, लेकिन अंततः जीत उन्हीं की होती है।
सुनील कुमार महला, फ्रीलांस राइटर, कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार, पिथौरागढ़, उत्तराखंड।
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