लखनऊ
राजधानी समेत प्रदेश के विभिन्न टोल प्लाजाओं पर कैशलेस टोल व्यवस्था लागू करने के पहले ही दिन स्थिति पूरी तरह असमंजस और अव्यवस्था से भरी नजर आई। जहां एक ओर टोल कर्मी इसे अनिवार्य बताते हुए नकद भुगतान लेने से बचते दिखाई दिए, वहीं दूसरी ओर वाहन चालक आधिकारिक अधिसूचना (नोटिफिकेशन) की मांग पर अड़े रहे। स्पष्ट आदेशों के अभाव में दिनभर कई स्थानों पर बहस, नोकझोंक और हाई-वोल्टेज ड्रामा देखने को मिला।
बताया गया कि टोल प्लाजाओं पर तैनात कर्मचारियों ने कैशलेस भुगतान को जरूरी बताते हुए फास्टैग या डिजिटल माध्यम से भुगतान करने का दबाव बनाया, लेकिन जब उनसे इस संबंध में सरकारी नोटिफिकेशन दिखाने को कहा गया, तो वे कोई ठोस दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सके। कई टोल प्रबंधकों ने यह कहकर मामला टालने की कोशिश की कि आदेश उनके मुख्यालय से जारी हुआ है, लेकिन उसकी लिखित प्रति उपलब्ध नहीं करा सके।
इस स्थिति के चलते वाहन चालकों में भ्रम की स्थिति बनी रही। कुछ लोग डिजिटल भुगतान के विकल्प जैसे क्यूआर कोड का इस्तेमाल कर आगे बढ़ गए, लेकिन बड़ी संख्या में ऐसे वाहन चालक भी रहे जो बिना स्पष्ट आदेश के कैशलेस व्यवस्था को मानने के लिए तैयार नहीं हुए। कई स्थानों पर लोग नोटिफिकेशन दिखाने की मांग को लेकर टोल प्लाजा पर ही रुक गए, जिससे यातायात भी प्रभावित हुआ।
हालांकि दिनभर चली इस खींचतान के बीच कई टोल प्लाजाओं पर अंततः नकद भुगतान भी स्वीकार किया गया, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि कैशलेस व्यवस्था को लेकर जमीनी स्तर पर अभी पूरी तैयारी नहीं है। प्रशासनिक स्तर पर स्पष्ट दिशा-निर्देशों की कमी और समन्वय के अभाव ने इस व्यवस्था को पहले ही दिन सवालों के घेरे में ला खड़ा किया।
विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी नई व्यवस्था को लागू करने से पहले स्पष्ट और व्यापक सूचना देना बेहद जरूरी होता है। यदि समय रहते स्पष्ट नोटिफिकेशन जारी कर दिया जाता और टोल कर्मियों को उचित प्रशिक्षण दिया जाता, तो इस तरह की स्थिति से बचा जा सकता था। फिलहाल, पहले दिन के अनुभव ने यह संकेत दे दिया है कि कैशलेस टोल प्रणाली को पूरी तरह सफल बनाने के लिए अभी और तैयारी और स्पष्टता की आवश्यकता है।
आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रशासन इस स्थिति से क्या सबक लेता है और किस तरह इस व्यवस्था को सुचारू रूप से लागू करता है, ताकि आम जनता को किसी प्रकार की असुविधा का सामना न करना पड़े।


