‘हाफ-एनकाउंटर’ संस्कृति पर रोक, गैर-जरूरी फायरिंग अस्वीकार्य
प्रयागराज। पुलिस मुठभेड़ों को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक और सख्त फैसला सुनाया है। अदालत ने पुलिस के तथाकथित ‘हाफ-एनकाउंटर’ तरीकों पर कड़ी नाराजगी जताते हुए स्पष्ट किया है कि अपराधी को सजा देना अदालत का काम है, पुलिस का नहीं।
हाईकोर्ट ने कहा कि प्रमोशन, वाहवाही या सोशल मीडिया फेम के लिए की जाने वाली फायरिंग न सिर्फ गलत है, बल्कि कानून के खिलाफ भी है। अदालत ने गैर-जरूरी फायरिंग और शरीर के ऐसे हिस्से पर गोली मारने को पूरी तरह अस्वीकार्य बताया है, जिससे गंभीर चोट या मौत की आशंका हो।
हाफ-एनकाउंटर पर कड़ा रुख
कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि अपराधियों को डराने या सबक सिखाने के नाम पर गोली चलाना कानून के शासन के विरुद्ध है। पुलिस का काम केवल कानून का पालन कराना है, न कि न्यायाधीश बनना।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिया कि—
किसी भी एनकाउंटर में मौत या गंभीर चोट की स्थिति में
तुरंत एफआईआर दर्ज की जाए
मामले की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच हो।
अदालत ने कहा कि ऐसी घटनाओं को छिपाने या लीपापोती करने की प्रवृत्ति गंभीर अपराध की श्रेणी में आएगी।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस के लिए 6 सूत्रीय दिशा-निर्देश जारी किए हैं, जिनका सख्ती से पालन अनिवार्य होगा।
इन निर्देशों के उल्लंघन की स्थिति में—संबंधित एसपी और एसएसपी को जिम्मेदार माना जाएगा,
उनके खिलाफ व्यक्तिगत अवमानना की कार्रवाई की जाएगी।
हाईकोर्ट ने दो टूक कहा—
“सजा देने का अधिकार केवल न्यायालय को है।पुलिस अगर इस दायरे से बाहर जाती है, तो वह स्वयं कानून तोड़ने की दोषी होगी।”
इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला उत्तर प्रदेश ही नहीं, बल्कि पूरे देश की पुलिस व्यवस्था के लिए एक कड़ा संदेश है।
अब एनकाउंटर की आड़ में की जाने वाली गैरकानूनी फायरिंग पर शून्य सहनशीलता होगी और कानून से ऊपर कोई नहीं माना जाएगा—चाहे वह वर्दी में ही क्यों न हो।

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