प्रयागराज
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के लाखों शिक्षामित्रों से जुड़े एक अहम मामले में बड़ा निर्देश जारी किया है। कोर्ट ने राज्य सरकार को आदेश दिया है कि प्राथमिक विद्यालयों में कार्यरत शिक्षामित्रों के नियमितीकरण और उन्हें सहायक अध्यापक के समान वेतन देने के मुद्दे पर दो महीने के भीतर स्पष्ट और सकारण निर्णय लिया जाए।
यह आदेश न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान की एकल पीठ द्वारा देवरिया निवासी निघत फिरदौस की याचिका का निस्तारण करते हुए दिया गया। याचिका में कहा गया था कि वह लंबे समय से शिक्षामित्र के रूप में कार्य कर रही हैं, लेकिन उन्हें सहायक अध्यापक के बराबर वेतन और सेवा सुरक्षा का लाभ नहीं मिल रहा है।
कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि याची तीन सप्ताह के भीतर सभी आवश्यक दस्तावेजों के साथ अपना विस्तृत प्रत्यावेदन राज्य सरकार को प्रस्तुत करें। इसके बाद राज्य सरकार याची को सुनवाई का पूरा अवसर प्रदान करते हुए निर्णय लेगी। कोर्ट ने यह भी कहा कि निर्णय लेते समय केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के 11 जून 2025 के दिशा-निर्देशों और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व में दिए गए फैसलों का अनुपालन किया जाए।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के ‘जग्गो बनाम भारत संघ’ और ‘श्रीपाल व अन्य’ मामलों का भी हवाला दिया गया, जिनमें शिक्षामित्रों के अधिकारों और सेवा शर्तों को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणियां की गई थीं। इसके अलावा तेज बहादुर मौर्य एवं 114 अन्य के मामले में भी समान मुद्दे उठाए गए थे, जिन पर पहले ही दिशा-निर्देश जारी किए जा चुके हैं।
कोर्ट ने कहा कि इन सभी पूर्व आदेशों और नीतिगत निर्देशों के आलोक में अपर मुख्य सचिव (बेसिक शिक्षा) के माध्यम से राज्य सरकार को समुचित निर्णय लेना होगा। इस फैसले से प्रदेश के हजारों शिक्षामित्रों को राहत मिलने की उम्मीद है, जो लंबे समय से नियमितीकरण और समान वेतन की मांग कर रहे


