भरत चतुर्वेदी
देश आज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (ए आई ) और तकनीकी नवाचार के क्षेत्र में वैश्विक पहचान बनाने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। ऐसे समय में यदि किसी प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान पर यह आरोप लगे कि उसने किसी व्यावसायिक (कमर्शियल) रोबोट को अपना स्वदेशी नवाचार बताकर प्रस्तुत किया, तो यह केवल संस्थान की नहीं बल्कि पूरे देश की साख से जुड़ा मामला बन जाता है।
हाल ही में सोशल मीडिया पर उठे विवाद के केंद्र में है गलगोटिस यूनिवर्सिटी । आरोप है कि दिल्ली में आयोजित एक अ आई समिट के दौरान प्रदर्शित रोबोट को विश्वविद्यालय की अपनी उपलब्धि के रूप में प्रचारित किया गया, जबकि वह एक व्यावसायिक रूप से उपलब्ध उत्पाद बताया जा रहा है। हालांकि विश्वविद्यालय की ओर से आधिकारिक और विस्तृत स्पष्टीकरण की प्रतीक्षा है, लेकिन सोशल मीडिया पर यह मुद्दा तेजी से चर्चा में आ गया।
भारत आज ‘मेक इन इंडिया’, ‘डिजिटल इंडिया’ और ‘स्टार्टअप इंडिया’ जैसे अभियानों के माध्यम से तकनीकी आत्मनिर्भरता का संदेश दे रहा है। यदि किसी मंच पर विदेशी या व्यावसायिक तकनीक को स्वदेशी नवाचार के रूप में प्रस्तुत किया गया हो, तो यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की विश्वसनीयता को नुकसान पहुँचा सकता है।वैश्विक निवेशक, शोध संस्थान और तकनीकी साझेदार भारतीय संस्थानों से पारदर्शिता और प्रामाणिकता की अपेक्षा रखते हैं। ऐसे में यदि तथ्यों को बढ़ा-चढ़ाकर या गलत ढंग से प्रस्तुत किया जाए, तो इससे भविष्य के सहयोग और भरोसे पर असर पड़ सकता है।
शिक्षा संस्थानों की जिम्मेदारी
विश्वविद्यालय केवल डिग्री देने के केंद्र नहीं होते, वे राष्ट्र के बौद्धिक चरित्र का निर्माण करते हैं। उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे शोध, नवाचार और प्रस्तुतिकरण में पूर्ण पारदर्शिता बरतें।यदि किसी तकनीक को प्रदर्शित किया जाता है, तो स्पष्ट रूप से यह बताया जाना चाहिए कि:
क्या वह संस्थान का स्वयं का शोध है?क्या वह किसी स्टार्टअप या कंपनी के साथ साझेदारी का परिणाम है?
या वह केवल एक प्रदर्शन (डेमो) के रूप में मंगाया गया उत्पाद है?
इन तथ्यों की स्पष्ट जानकारी न देना भ्रम और अविश्वास को जन्म देता है।
सोशल मीडिया और जवाबदेही
इस विवाद को सोशल मीडिया ने व्यापक रूप से उछाला। हजारों व्यूज़ और प्रतिक्रियाओं ने यह संकेत दिया कि आम जनता अब तकनीकी दावों को आंख बंद कर स्वीकार नहीं करती। आज का डिजिटल युग पारदर्शिता की मांग करता है। कोई भी दावा मिनटों में जांच के दायरे में आ जाता है। ऐसे में संस्थानों को और अधिक सतर्क और जिम्मेदार होना चाहिए।
यदि जांच में यह सिद्ध होता है कि किसी कमर्शियल रोबोट को संस्थान की मौलिक उपलब्धि बताकर प्रस्तुत किया गया, तो यह न केवल नैतिक त्रुटि होगी बल्कि शैक्षणिक ईमानदारी पर भी प्रश्नचिह्न लगाएगी।
इससे छात्रों का भरोसा प्रभावित हो सकता है,शोध की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठ सकते हैं।अंतरराष्ट्रीय मंचों पर देश की छवि को धक्का लग सकता है
इस पूरे प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण है तथ्यात्मक स्पष्टता। यदि कोई गलतफहमी हुई है, तो विश्वविद्यालय को पारदर्शी ढंग से अपना पक्ष रखना चाहिए। यदि कोई त्रुटि हुई है, तो उसे स्वीकार कर सुधार की दिशा में कदम उठाने चाहिए।
भारत की तकनीकी प्रगति केवल दावों से नहीं, बल्कि वास्तविक नवाचार और ईमानदारी से मजबूत होगी।
देश की प्रतिष्ठा किसी एक संस्था से बड़ी है। इसलिए हर शिक्षण संस्थान की जिम्मेदारी है कि वह अपने हर कदम से राष्ट्र की साख को मजबूत करे, न कि उसे संदेह के घेरे में डाले। तकनीकी युग में उपलब्धि से अधिक महत्वपूर्ण है उसकी सत्यता क्योंकि अंततः वही देश को विश्वगुरु बनने की दिशा में आगे बढ़ाती


