गाजियाबाद। राजनगर निवासी हरीश राणा की 13 वर्षों की लंबी और दर्दभरी संघर्षगाथा अब बड़े पर्दे पर नजर आ सकती है। उनकी जिंदगी, जो अब तक अस्पतालों और अदालतों तक सीमित थी, जल्द ही फिल्म के जरिए लोगों तक पहुंच सकती है।
जानकारी के मुताबिक, मुंबई के एक लेखक-निर्माता ने हरीश राणा के जीवन पर बायोपिक बनाने की इच्छा जताई है। इस संबंध में उन्होंने हरीश के अधिवक्ता मनीष जैन से संपर्क भी किया है। हालांकि, मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए वकील ने फिलहाल कुछ समय इंतजार करने की सलाह दी है।
अधिवक्ता के अनुसार, यह कहानी केवल एक बीमारी या कानूनी लड़ाई तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक पिता के साहस, परिवार के धैर्य और न्यायपालिका की संवेदनशीलता की मिसाल भी है। यह एक ऐसे संघर्ष की दास्तान है, जिसमें इंसानी भावनाएं, उम्मीद और पीड़ा एक साथ जुड़ी हुई हैं।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद हरीश राणा को दिल्ली स्थित एम्स के पैलिएटिव केयर वार्ड में भर्ती कराया गया है, जहां उन्हें असहनीय पीड़ा से राहत देने के लिए उपचार जारी है।
इस पूरे मामले में हरीश के पिता अशोक राणा का निर्णय भी चर्चा में रहा है, जिन्होंने अंगदान का फैसला लेकर समाज के सामने एक प्रेरणादायक उदाहरण पेश किया। 13 वर्षों तक बेटे को इस स्थिति में देखना परिवार के लिए बेहद कठिन रहा, लेकिन उन्होंने धैर्य और साहस के साथ इस संघर्ष को जिया।
अब अगर यह बायोपिक बनती है, तो हरीश राणा की कहानी समाज के सामने एक गहरी संवेदनात्मक और प्रेरणादायक संदेश के रूप में सामने आ सकती है।


