गुरु तेग बहादुर जी के 350वें शहीदी दिवस पर श्रद्धांजलि : त्याग, साहस और मानवाधिकारों की अनंत ज्योति

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सूर्या अग्निहोत्री (यूथ इंडिया न्यूज ग्रुप)
गुरु तेग बहादुर जी का नाम लेते ही त्याग, अदम्य साहस और मानवाधिकारों की रक्षा का अद्भुत प्रतीक सामने उभर आता है। उनकी शहादत केवल सिक्ख इतिहास की घटना नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के लिए स्वतंत्रता, धार्मिक स्वतंत्रता और न्याय के सर्वोच्च आदर्श का संदेश है। वर्ष 2025 में जब हम गुरु तेग बहादुर जी की 350वीं शहीदी दिवस पर उन्हें नमन कर रहे हैं, तब यह अवसर केवल उनके बलिदान को याद करने का नहीं, बल्कि उनके द्वारा दिखाए गए उस मार्ग को समझने का भी है जो आज भी दुनिया के लिए एक प्रकाश स्तंभ है। गुरु तेग बहादुर जी, जो सिख पंथ के नौवें गुरु थे, का व्यक्तित्व अत्यंत शांत, गंभीर और आध्यात्मिकता से ओतप्रोत था। उनका जीवन गुरु नानक देव जी की करुणा, गुरु अंगद देव जी की विनम्रता, गुरु अमरदास जी की सेवा भावना, गुरु रामदास जी की सरलता, गुरु अर्जन देव जी की शहादत और गुरु हरगोबिन्द साहिब की दृढ़ता का मिश्रित स्वरूप था। उन्होंने संसार को सिखाया कि आस्था, दया और धर्म का रक्षक वही है, जो दूसरों के अधिकारों के लिए अपने प्राणों का बलिदान कर दे।
1606 में गुरु अर्जन देव जी की शहादत के बाद मोग़ल सत्ता के अत्याचारों और धार्मिक कट्टरता का दौर बढ़ गया था। कश्मीरी पंडितों के प्रताड़ित होने और जबरन धर्म परिवर्तन के चलते गुरु तेग बहादुर जी दिल्ली दरबार तक पहुँचे और न्याय की गुहार लगाई। इतिहास इस तथ्य का गवाह है कि उस कठिन समय में गुरु तेग बहादुर जी ने उन निर्दोषों की आवाज उठाई, जिनका कोई सहारा नहीं था। उन्होंने कहा था कि यदि एक व्यक्ति धर्मभीरु लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए खड़ा हो जाए तो हजारों की गरिमा सुरक्षित रह सकती है। जब औरंगज़ेब द्वारा गुरु तेग बहादुर जी को अपनी आस्था छोड़ने या मृत्यु चुनने का विकल्प दिया गया, तब गुरु साहिब ने बिना किसी भय के सत्य और धर्म का मार्ग चुना। उन्होंने कहा— “धर्म हेत शंका साध, तिस का किया विचार।” उनके ये शब्द आज भी मानवता को सिखाते हैं कि सही मार्ग पर चलने वाला कभी अकेला नहीं होता, उसके साथ पूरी सृष्टि की शक्ति होती है।
24 नवंबर 1675 को चांदनी चौक, दिल्ली में गुरु तेग बहादुर जी ने जो बलिदान दिया, वह किसी एक समुदाय की रक्षा के लिए नहीं था, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए था जिसे अपनी आस्था के अनुसार जीवन जीने का अधिकार मिलना चाहिए। इसलिए उन्हें “हिन्द की चादर” कहा गया—भारत की प्रतिष्ठा, नैतिकता और आस्था की ढाल। उनकी शहादत ने विश्व को यह सन्देश दिया कि धर्म किसी एक का अधिकार नहीं, बल्कि सबका मूल अधिकार है। उनका बलिदान धर्म की परिभाषा को नीति, नैतिकता और सार्वभौमिक स्वतंत्रता में बदल देता है।
गुरु तेग बहादुर जी के जीवन का सबसे पवित्र संदेश यह है कि मनुष्य को अपने अंदर के भय से मुक्त होना चाहिए। उन्होंने कहा कि सच्चा आध्यात्मिक मनुष्य वही है जो सुख-दुःख में समान है, लोभ-मोह से मुक्त है और सत्य की राह पर अडिग रहता है। उनका जीवन यह सिखाता है कि बाहरी युद्ध से पहले मनुष्य को अपने भीतर के अज्ञान और भय पर विजय पानी होती है। गुरु साहिब ने जीवन भर गरीबों, दलितों और शोषितों की सेवा की, लोगों को गुरु की बानी के माध्यम से आस्था और आध्यात्मिकता का मार्ग दिखाया और मानवता में एकता का संदेश दिया। गुरु गोबिंद सिंह जी, जो गुरु तेग बहादुर जी के सुपुत्र थे, ने अपने पिता को “त्याग का मूर्तिमान स्वरूप” कहा। गुरु तेग बहादुर जी का बलिदान ही आगे चलकर खालसा पंथ की स्थापना का कारण बना। गुरु गोबिंद सिंह जी ने कहा था कि यदि हिंद की चादर न होते, तो भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक आत्मा बच ही नहीं पाती। आज जब विश्व कई तरह की चुनौतियों से जूझ रहा है—धार्मिक कट्टरता, मानवाधिकारों के उल्लंघन, नस्लीय भेदभाव और हिंसा—तब गुरु तेग बहादुर जी की शिक्षाएँ पहले से ज्यादा प्रासंगिक हो उठती हैं। उनका जीवन हमें सिखाता है कि जब भी अन्याय किसी पर भी हो, हमें केवल दर्शक बनकर नहीं बैठना चाहिए। सत्य, मानवता और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए आवाज उठाना ही गुरु तेग बहादुर जी का सच्चा संदेश है।
350वीं शहीदी दिवस पर हम गुरु तेग बहादुर जी को केवल स्मरण नहीं कर रहे, बल्कि उनके दिखाए मार्ग को जीवन में धारण करने का संकल्प भी ले रहे हैं। उनका संदेश अमर है— “दूसरों के लिए जिओ, सत्य के लिए डट जाओ, और मानवता के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर दो।” गुरु तेग बहादुर जी की शहादत मानवता के इतिहास का वह अमर अध्याय है, जिसका तेज 350 वर्ष बाद भी उतना ही उज्ज्वल है, जितना उस दिन था जब उन्होंने अपने प्राणों की आहुति दी। उनकी प्रेरणा, उनका साहस और उनका त्याग सदा-सर्वदा संसार को धर्म, मानवता और सत्य की राह पर चलने के लिए प्रेरित करता रहेगा।
वाहेगुरु जी का खालसा, वाहेगुरु जी की फतेह।

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