लखनऊ। राजधानी के सरकारी अस्पतालों में स्वास्थ्य व्यवस्थाओं की गंभीर खामियां एक बार फिर उजागर हुई हैं। शहर के विभिन्न अस्पतालों में करीब 65 वेंटिलेटर बंद पड़े हैं, जिसके चलते गंभीर मरीजों को समय पर इलाज नहीं मिल पा रहा है। हालात ऐसे हैं कि मरीजों को एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल तक भटकना पड़ रहा है और कई मामलों में यह देरी जानलेवा साबित हो रही है।
हाल ही में देवरिया से रेफर होकर आए एक मरीज की मौत ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है। परिजन वेंटिलेटर की तलाश में अस्पताल दर अस्पताल भटकते रहे, लेकिन समय पर सुविधा नहीं मिल सकी। यह घटना सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े करती है।
जानकारों के मुताबिक, वेंटिलेटर बंद रहने की सबसे बड़ी वजह विशेषज्ञ डॉक्टरों और प्रशिक्षित स्टाफ की कमी है। उपकरण उपलब्ध होने के बावजूद उन्हें संचालित करने के लिए जरूरी मैनपावर नहीं है, जिससे मरीजों को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है।
लोकबंधु अस्पताल में 40 वेंटिलेटर मौजूद हैं, लेकिन केवल 10 ही चालू हालत में हैं। बीते साल हुए अग्निकांड के बाद आईसीयू का निर्माण कार्य अभी तक पूरा नहीं हो सका है, जिससे बाकी वेंटिलेटर इस्तेमाल में नहीं आ पा रहे हैं।
इसी तरह बलरामपुर अस्पताल में 60 वेंटिलेटर बेड हैं, लेकिन इनमें से केवल 28 का ही संचालन हो रहा है। यहां भी विशेषज्ञों और स्टाफ की कमी के चलते पूरी क्षमता का उपयोग नहीं हो पा रहा है।
इसके अलावा रानी लक्ष्मीबाई अस्पताल और ठाकुरगंज अस्पताल जैसे अन्य चिकित्सा केंद्रों में भी वेंटिलेटर मौजूद हैं, लेकिन संसाधनों के अभाव में मरीजों को नियमित रूप से इनका लाभ नहीं मिल पा रहा है।
वहीं, पीजीआई, केजीएमयू और लोहिया संस्थान जैसे बड़े चिकित्सा संस्थानों पर मरीजों का भारी दबाव है। यहां प्रदेश ही नहीं, बल्कि पड़ोसी राज्यों से भी मरीज इलाज के लिए आते हैं, जिससे उपलब्ध वेंटिलेटर कम पड़ जाते हैं।
गौरतलब है कि सरकारी अस्पतालों में वेंटिलेटर पर इलाज मुफ्त होता है, जबकि बड़े संस्थानों में प्रतिदिन 10 से 20 हजार रुपये तक का खर्च आता है और निजी अस्पतालों में यह खर्च एक से डेढ़ लाख रुपये प्रतिदिन तक पहुंच जाता है। ऐसे में गरीब मरीजों के लिए सरकारी अस्पताल ही एकमात्र सहारा होते हैं।


