लखनऊ| बुंदेलखंड क्षेत्र में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत करोड़ों रुपये के कथित घपले का मामला सामने आया है। शुरुआत में यह गड़बड़ी बेहद चालाकी से अंजाम दी गई, लेकिन बीमा राशि के बंटवारे को लेकर किसानों, दलालों और अफसरों के बीच उपजे विवाद ने पूरे खेल की पोल खोल दी। जिन किसानों के खातों में बीमा राशि पहुंची, उनसे हिस्सा लेने के लिए राजस्व विभाग और बीमा कंपनी से जुड़े लोग गांव-गांव दस्तक देने लगे। कुछ किसानों के हिस्सा देने से इनकार करने पर विवाद बढ़ा और मामला सामने आ गया।

जांच के दौरान एक के बाद एक परतें खुलती चली गईं। महोबा जनपद के छिकेरा गांव में जब अधिकारी पहुंचे तो बड़ी संख्या में किसान एकत्र हो गए। किसानों का कहना है कि उनकी जमीन के नाम पर बीमा राशि निकाली गई है, जो उन्हें अब तक नहीं मिली। किसान प्रदीप राजपूत के अनुसार, चरखारी तहसील के गोपालपुरा गांव में किसानों को उस समय संदेह हुआ जब उनके खातों में अचानक बीमा की रकम आई। जब उन्होंने अधिकारियों से जानकारी मांगी तो कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया गया। इसी बीच लेखपालों द्वारा फसल क्षति अधिक दिखाने और दलालों द्वारा रकम दिलाने के नाम पर हिस्सा मांगने की बातें सामने आईं। किसानों के इंकार करने पर विवाद और गहराता चला गया।

चरखारी के गोहा गांव के किसानों ने बताया कि क्रॉप कटिंग के आधार पर करीब तीन करोड़ रुपये की बीमा राशि आई, जबकि वास्तविकता में फसल का कोई बड़ा नुकसान नहीं हुआ था। पनवाड़ी के नटर्रा गांव में तो बंटवारे को लेकर बिचौलियों और किसानों के बीच मारपीट तक की नौबत आ गई। दूसरी ओर, जिन किसानों को बीमा राशि नहीं मिली, उन्होंने एकजुट होकर प्रदर्शन शुरू कर दिया। जब अधिकारियों ने मामले की जांच कराई तो यह साफ हुआ कि हर स्तर पर मनमानी की गई है।

केरारी गांव के किसान नेता मनोहर सिंह ने बताया कि जिले में करीब 80 करोड़ रुपये की बीमा राशि बांटे जाने और आठ करोड़ रुपये और आने की खबरों के बाद तत्कालीन जिलाधिकारी मृदुल चौधरी की मौजूदगी में तहसील में बैठक हुई। बैठक में जब यह सवाल उठा कि बीमा राशि किन किसानों को दी गई है तो कुछ अधिकारी नाराज हो गए और माहौल तनावपूर्ण हो गया। इसके बाद डीएम ने अलग से बातचीत की। संदेह बढ़ने पर खतौनियां एकत्र कर सत्यापन की रणनीति बनाई गई।

झांसी के किसान अजित सिंह के अनुसार, उनके परिचित ने बताया कि सिमरधा गांव में एक व्यक्ति खुद को बीमा कंपनी का कर्मचारी बताकर किसान के घर पहुंचा और अपना हिस्सा मांगने लगा। सवाल पूछने पर वह स्पष्ट जानकारी देने से बचता रहा। शक होने पर उप निदेशक कृषि से शिकायत की गई। इसके बाद दो सितंबर को गरौठा के उप संभागीय कृषि अधिकारी शरद चंद्र मौर्य को जांच सौंपी गई, जिसकी रिपोर्ट 15 सितंबर 2025 को प्रस्तुत की गई।

जांच रिपोर्ट में सामने आया कि सिमरधा गांव के कई किसानों ने रबी सीजन 2024 में फसल बीमा कराया था और उन्हें करीब 10.87 लाख रुपये का भुगतान हुआ। जबकि पूरे प्रदेश में उस सीजन में कहीं भी 10 प्रतिशत से अधिक फसल क्षति नहीं हुई थी, इसके बावजूद लेखपाल द्वारा 60 प्रतिशत क्षति दर्शा दी गई। रिपोर्ट में पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच की संस्तुति की गई है।

इस प्रकरण के सामने आने के बाद झांसी में भी जांच तेज कर दी गई है। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत गैर ऋणी कृषकों द्वारा भूमि न होने के बावजूद खरीफ-2024 और रबी 2024-25 में क्षतिपूर्ति लेने के मामलों की पड़ताल के लिए तहसीलवार टीमें गठित की गई हैं। जिलाधिकारी मृदुल चौधरी ने सात दिन के भीतर रिपोर्ट देने के निर्देश दिए हैं। टीमें पहले उन चकबंदी वाले गांवों की जांच करेंगी, जहां भूमि का एकीकरण नहीं हुआ है, इसके बाद अन्य गांवों में बीमा क्षतिपूर्ति पाने वाले मामलों की पड़ताल की जाएगी।

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