– 15 वर्ष से बंद पड़ी फैक्ट्रियाँ, 2000–2005 के बीच सब्सिडी हड़पने, मिलावटी खाद बनाने और फर्जी उत्पादन दिखाने के हुए थे खेल
फर्रुखाबाद। जिले की दो उर्वरक कंपनियाँ—गंगेश फ़र्टिलाइज़र और मदन मोहन (मदन माधव) फ़र्टिलाइज़र प्राइवेट लिमिटेड—एक बार फिर सुर्खियों में हैं। कन्हैया मुरहास के निकट स्थित ये दोनों फैक्ट्रियाँ पिछले 15 वर्ष से बंद पड़ी हैं, लेकिन 2000 से 2005 के बीच सरकारी सब्सिडी में भारी अनियमितताओं, खाद में बालू मिलाने और उत्पादन के फर्जी आँकड़े प्रस्तुत करने जैसे गंभीर आरोप आज भी जस के तस खड़े हैं।
आरोपों के अनुसार—दोनों कंपनियों ने सरकार से कई करोड़ से लेकर अरबों रुपये तक की सब्सिडी ली।
वास्तविक उत्पादन बहुत कम था, लेकिन कागजों में इसे कई गुना बढ़ाकर दिखाया गया।
जांच में यह भी सामने आया कि खाद के उत्पादन में बड़े पैमाने पर बालू मिलाई जाती थी, जिससे किसानों को भारी नुकसान हुआ।
घोटाले के उजागर होने के बाद दोनों कंपनियाँ धीरे-धीरे ठप होती गईं और 2010 के आसपास उत्पादन पूरी तरह बंद हो गया। आज हालत यह है कि फैक्ट्रियाँ जर्जर हो चुकी हैं और परिसर वीरान पड़ा है।
मदन मोहन/मदन माधव फ़र्टिलाइज़र प्राइवेट लिमिटेड के जिन निदेशकों पर नामजद मुकदमे और सब्सिडी घोटाले के आरोप लगे थे, वे हैं—बेनी माधव अग्रवाल, अरविंद अग्रवाल, प्रदीप अग्रवाल, मनोज अग्रवाल, इन पर फर्जी दस्तावेज लगाने, गलत उत्पादन आँकड़े दिखाने और सरकारी सब्सिडी का दुरुपयोग करने के आरोप दर्ज हुए थे।
इसके बावजूद आज तक किसी पर कोई सख्त कार्रवाई नहीं हुई, न ही किसी अधिकारी की जवाबदेही तय हुई।
विभागीय सूत्रों के अनुसार,
सरकारी सब्सिडी में कम से कम 25 से 40 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ,कई अभिलेख इसे 100 करोड़ रुपये से अधिक बताते हैं, जबकि स्थानीय सूत्रों का दावा है कि यह अरबों रुपये का घोटाला है।
जिन कारणों से यह बड़ा मामला वर्षों से ठंडे बस्ते में पड़ा है, वे हैँ, राजनीतिक संरक्षण का संदेह, विभागीय मिलीभगत, आवश्यक फाइलों का गायब होना या रोक दिया जाना, इन सभी कारणों ने मिलकर इस गंभीर मामले को दबा दिया।
घोटाले के पुनः चर्चा में आने के बाद एक केंद्रीय राज्य मंत्री ने कहा,“यह मामला मेरे संज्ञान में आया है। शीघ्र ही जांच कमेटी गठित कर बंद पड़ी फाइलों का पुनः अवलोकन कराया जाएगा।”
उनके इस बयान से उम्मीद जगी है कि वर्षों से रुकी जांच अब फिर तेज हो सकती है।
किसानो नें मांग की, कि घोटाले की सीबीआई या ईडी से दोबारा जांच कराई जाए।आरोपित निदेशकों पर कठोर कार्रवाई की जाए।सरकारी धन की वसूली की जाए। मिलावटी खाद से नुकसान उठाने वाले किसानों को उचित मुआवजा दिया जाए।
कन्हैया मुरहास के निकट खंडहर बनी फैक्ट्रियों को देखने के बाद भी आज यही सवाल गूंज रहा है,
“जब घोटाला इतना बड़ा था, तो 15 वर्षों में दोषी कौन है और जांच को आखिर किसने रोक दिया?”






