ब्रिटेन: दुनिया के विकसित देशों में शामिल ब्रिटेन में भी पुरुषों और महिलाओं के वेतन के बीच अंतर अब तक पूरी तरह समाप्त नहीं हो सका है। हालिया विश्लेषण के अनुसार यदि सुधार की वर्तमान गति जारी रही तो जेंडर पे गैप को पूरी तरह खत्म होने में करीब 30 वर्ष और लग सकते हैं, यानी यह लक्ष्य लगभग 2056 तक ही हासिल हो पाएगा।
यह आकलन ट्रेड्स यूनियन कांग्रेस (टीयूसी) द्वारा आधिकारिक वेतन आंकड़ों के विश्लेषण के आधार पर किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, ब्रिटेन में पुरुषों और महिलाओं की औसत आय में फिलहाल 12.8 प्रतिशत का अंतर है।
टीयूसी के अनुसार यह अंतर सालाना लगभग 2,548 पाउंड स्टर्लिंग के बराबर बैठता है। इसका अर्थ यह हुआ कि औसतन एक महिला कर्मचारी साल के करीब 47 दिन प्रभावी रूप से बिना वेतन काम करती है, यदि तुलना पुरुष कर्मचारियों से की जाए।
ब्रिटेन में 250 से अधिक कर्मचारियों वाले संगठनों के लिए जेंडर पे डेटा सार्वजनिक करना अनिवार्य है। इसी आधिकारिक डेटा के आधार पर यह पाया गया कि सबसे अधिक वेतन असमानता फाइनेंस और इंश्योरेंस सेक्टर में है, जहां जेंडर पे गैप 27.2 प्रतिशत तक पहुंच गया है।
इसके विपरीत लीजर सर्विस सेक्टर में यह अंतर अपेक्षाकृत कम, लगभग 1.5 प्रतिशत दर्ज किया गया। हालांकि शिक्षा, स्वास्थ्य और सोशल केयर जैसे क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी अधिक है, फिर भी इन क्षेत्रों में भी वेतन असमानता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।
आयु वर्ग के आधार पर देखा जाए तो 50 से 59 वर्ष के कर्मचारियों में जेंडर पे गैप सबसे अधिक है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसका एक प्रमुख कारण यह है कि कई महिलाएं देखभाल संबंधी जिम्मेदारियों के कारण करियर में ब्रेक लेती हैं या कम वेतन वाले लचीले विकल्प चुनती हैं।
टीयूसी ने वेतन असमानता को कम करने के लिए फ्लेक्सिबल वर्किंग की बेहतर व्यवस्था और सुलभ चाइल्डकेयर सुविधाओं की मांग की है। संगठन का कहना है कि जब तक देखभाल की जिम्मेदारियों का संतुलित बंटवारा नहीं होगा, तब तक आय में समानता पाना कठिन रहेगा।
शिक्षा क्षेत्र में जेंडर पे गैप लगभग 17 प्रतिशत और हेल्थ व सोशल केयर क्षेत्र में 12.8 प्रतिशत बताया गया है। यह दर्शाता है कि महिला-प्रधान क्षेत्रों में भी संरचनात्मक असमानताएं बनी हुई हैं।
टीयूसी के जनरल सेक्रेटरी पॉल नॉवाक ने कहा कि हाल ही में लागू किया गया एम्प्लॉयमेंट राइट्स एक्ट वेतन समानता की दिशा में एक सकारात्मक कदम है। हालांकि उन्होंने सरकार से पेड पैरेंटल लीव को और मजबूत करने की अपील की, ताकि माताएं और पिता दोनों देखभाल की जिम्मेदारियां बराबरी से निभा सकें।
विशेषज्ञों का मानना है कि जीवन यापन की बढ़ती लागत के दौर में यह वेतन असमानता कामकाजी महिलाओं पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव डालती है। ऐसे में नीतिगत सुधार, पारदर्शिता और संस्थागत जवाबदेही ही वह रास्ता है, जिससे आने वाले वर्षों में जेंडर पे गैप को वास्तविक रूप से कम किया जा सकता है।


