गीता जयंती केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि मानव जीवन में कर्तव्य, नैतिकता और आत्मज्ञान का संदेश देने वाला दिव्य उत्सव है। हर वर्ष मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाई जाने वाली गीता जयंती उस पवित्र क्षण की स्मृति है, जब श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र के युद्धभूमि में अर्जुन को जीवनदर्शन प्रदान किया था। यह वह ज्ञान है जो समय, समाज और परिस्थितियों को लांघते हुए आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना पाँच हजार वर्ष पहले था।
गीता: जीवन का मार्गदर्शक ग्रंथ
भगवद्गीता केवल धर्मग्रंथ नहीं, बल्कि एक जीवन प्रबंधन सूत्र है—जहाँ कर्तव्य कर्म भी है और मुक्ति का मार्ग भी।
यह सिखाती है कि संकट के क्षण में धैर्य ही धर्म है, सही निर्णय वही है जो निष्काम भाव से लिया जाए, और सफलता का वास्तविक आधार कर्म है, फल नहीं। आज जब आधुनिक जीवन तनाव, स्पर्धा और अनिश्चितताओं से घिरा हुआ है, गीता का प्रत्येक श्लोक मन को स्थिर करने वाली औषधि जैसा प्रभाव देता है।
समाज को जोड़ने वाला उत्सव
गीता जयंती केवल आध्यात्मिकता का उत्सव नहीं बल्कि सामुदायिक एकता का पर्व भी बन चुका है। नगरों और कस्बों में होने वाले गीता पाठ, व्याख्यान, शोभायात्राएँ और मानव श्रृंखला कार्यक्रम समाज को एक सूत्र में पिरोने का कार्य करते हैं।
इस वर्ष गीता जयंती को ऐतिहासिक रूप देने के लिए बड़े स्तर पर तैयारियाँ की गई हैं।
गीता न्यास ट्रस्ट पल-पल की गतिविधियों को संयोजित कर रहा है।
सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संस्थाएँ स्वेच्छा से जुड़ रही हैं।
युवाओं, महिलाओं और वरिष्ठ नागरिकों में विशेष उत्साह देखा जा रहा है।
मनन और आत्मचिंतन का अवसर
गीता का सार केवल पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि वह हमें अपने भीतर झाँकने, अपनी कमजोरियों को समझने और जीवन को अधिक सकारात्मक बनाने का अवसर प्रदान करती है।
श्रीकृष्ण का संदेश कहता है—
“जो हुआ अच्छा हुआ, जो हो रहा है अच्छा हो रहा है और जो होगा वह भी अच्छा ही होगा।”
इस संदेश में जीवन की अनिश्चितताओं से ऊपर उठकर जीने की कला छिपी है।
आज समाज में बढ़ती भौतिकता और तनाव के बीच गीता का संदेश और भी आवश्यक हो गया है।
यह मानसिक शांति देती है, आचरण को संतुलित करती है, और मनुष्य को अपने कर्तव्यों के प्रति सजग बनाती है।
गीता जयंती का दिन हमें याद दिलाता है कि यदि विचार शुद्ध हों और कर्म निष्काम, तो सफलता और संतोष दोनों अपने आप प्राप्त होते हैं।
गीता जयंती आत्मज्ञान, धर्म, कर्तव्य और समरसता का पवित्र उत्सव है। यह हमें केवल पूजा-पाठ की ओर नहीं ले जाती, बल्कि जीवन को अधिक अर्थपूर्ण, संतुलित और उद्देश्यपूर्ण बनाने की प्रेरणा देती है।
हर वर्ष की तरह यह दिन हमें श्रीकृष्ण के अमर संदेश—”कर्मण्येवाधिकारस्ते”—की याद दिलाता है और संकल्प दिलाता है कि हम अपने कर्मों से समाज, राष्ट्र और मानवता के हित में योगदान देते रहें।






