लखनऊ। प्रदेश में गोशालाओं को आत्मनिर्भर और पर्यावरण के अनुकूल बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया जा रहा है। प्रदेश सरकार अब गोशालाओं को सर्कुलर (चक्रीय) अर्थव्यवस्था से जोड़ने की तैयारी में है, जिसके तहत पशुधन विभाग जल्द ही Food and Agriculture Organization (एफएओ इंडिया) और दीनदयाल उपाध्याय पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय एवं गो अनुसंधान संस्थान के साथ त्रिपक्षीय समझौता ज्ञापन (एमओयू) करेगा।
इस पहल का उद्देश्य गोशालाओं को केवल आश्रय स्थल तक सीमित न रखकर उन्हें आर्थिक, पर्यावरणीय और वैज्ञानिक दृष्टि से मजबूत बनाना है। इसके तहत नीति निर्माण, अनुसंधान और जमीनी स्तर पर कार्यान्वयन के बीच बेहतर तालमेल स्थापित किया जाएगा, ताकि गोशालाएं आय सृजन का भी केंद्र बन सकें।
प्रस्तावित योजना के तहत चार प्रमुख क्षेत्रों पर विशेष फोकस किया जाएगा। इसमें हरे चारे की मजबूत मूल्य श्रृंखला विकसित करना, गोबर और कृषि अवशेषों का उपयोग कर कम्प्रेस्ड बायोगैस (सीबीजी) और बायो-सीएनजी का उत्पादन, तथा ‘वन हेल्थ’ अवधारणा के तहत पशु रोग निगरानी प्रणाली को सशक्त बनाना शामिल है। इससे न केवल गोशालाओं का संचालन बेहतर होगा, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और ऊर्जा उत्पादन को भी बढ़ावा मिलेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस मॉडल के जरिए गोशालाएं आत्मनिर्भर बन सकती हैं और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई मजबूती मिलेगी। गोबर और कृषि अपशिष्ट से ऊर्जा उत्पादन होने से जहां स्वच्छ ईंधन को बढ़ावा मिलेगा, वहीं किसानों की आय बढ़ाने में भी मदद मिलेगी।
पशुधन विभाग के अधिकारियों के अनुसार, इस पहल से प्रदेश में सतत विकास (सस्टेनेबल डेवलपमेंट) को नई गति मिलेगी और गोशालाओं को एक आधुनिक, उपयोगी और आर्थिक रूप से सशक्त इकाई के रूप में विकसित किया जा सकेगा।
कुल मिलाकर, यह योजना पारंपरिक गोशाला व्यवस्था को आधुनिक तकनीक और आर्थिक मॉडल से जोड़ने की दिशा में एक बड़ा और दूरदर्शी कदम मानी जा रही है, जिसका लाभ आने वाले समय में प्रदेश की ग्रामीण और पर्यावरणीय व्यवस्था दोनों को मिलेगा।
गोशालाओं को मिलेगी नई दिशा सर्कुलर अर्थव्यवस्था से जुड़ेंगी, बायोगैस और जैविक मॉडल पर होगा काम


