शमशाबाद, फर्रुखाबाद: क्षेत्र में बीते कई दिनों से जारी भीषण सर्दी (severe cold) अब किसानों (farmers) के लिए कहर बनकर टूट पड़ी है। गलन भरी ठंड के बीच लगातार पड़ रहे तुषार (पाले) ने आलू की फसल को बुरी तरह झुलसा दिया है। खेतों में खड़ी फसल को नुकसान पहुंचने से आलू किसानों के चेहरे मायूसी से भर गए हैं। प्राकृतिक प्रकोप के शिकार किसानों के सामने अब सबसे बड़ा सवाल खड़ा हो गया है—अब क्या होगा?
प्राप्त जानकारी के अनुसार पिछले कई दिनों से तापमान में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। घने कोहरे और कड़ाके की ठंड के बीच पड़ रहे पाले का असर साफ तौर पर खेतों में देखा जा सकता है। आलू जैसी प्रमुख नगदी फसल, जिससे किसान खुशहाली के सपने देख रहे थे, अब झुलसा रोग की चपेट में आ गई है।
हजारों की लागत, एक झटके में तबाही
किसानों का कहना है कि आलू की फसल तैयार करने में उन्होंने हाड़-तोड़ मेहनत की है। बीज, खाद, सिंचाई, दवा और मजदूरी पर हजारों से लेकर लाखों रुपये तक खर्च किए गए, लेकिन प्राकृतिक आपदा ने उनकी मेहनत पर पानी फेर दिया। खेतों में आलू की पौध झुलसने लगी है, जिससे फसल की बढ़वार रुक गई है।
किसानों की बढ़ी चिंता
किसानों में राजेश कुमार, सियाराम, सीताराम, संजीव कुमार, दिनेश चंद, राजीव कुमार, आशीष कुमार सहित कई अन्य किसानों ने बताया कि अत्यधिक सर्दी और घने कोहरे के बीच लगातार पड़ रहे पाले के कारण आलू की फसल झुलसा रोग का शिकार हो रही है। केवल आलू ही नहीं, बल्कि अन्य फसलों पर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
महंगी दवाइयों का सहारा
फसल को बचाने के लिए किसान बाजार से महंगी रासायनिक दवाइयों की खरीदारी कर रहे हैं। हालांकि किसानों का कहना है कि इतनी महंगी दवाइयां कितनी कारगर साबित होंगी, यह आने वाला समय ही बताएगा। ऊपर से चार–पांच दिनों से धूप नहीं निकलने के कारण दवाइयों का असर भी पूरी तरह दिखाई नहीं दे रहा है।
कर्ज का बोझ, भविष्य की चिंता
किसानों ने बताया कि आलू की खेती के लिए उन्होंने रिश्तेदारों और परिचितों से कर्ज लिया है, वहीं कुछ किसानों ने बैंकों से भी ऋण लिया है। अब फसल को हुए नुकसान के बाद उन्हें चिंता सता रही है कि आने वाले समय में यह कर्ज कैसे चुकाया जाएगा। किसानों का कहना है कि एक तरफ आलू की मंडी में मंदी का असर है, तो दूसरी तरफ प्राकृतिक आपदाएं उनकी कमर तोड़ रही हैं।
खुदाई पर भी असर
किसानों के अनुसार तुषार के प्रभाव से आलू की पौध जल जाती है और बढ़वार रुक जाती है। जब खुदाई का समय आता है तो अनुमान के अनुसार उत्पादन नहीं निकलता, जिससे नुकसान और बढ़ जाता है। यदि यही हालात बने रहे तो आने वाले दिनों में आलू किसानों की स्थिति और भी बदतर हो सकती है।
मायूस किसानों की गुहार
मायूस किसानों का कहना है कि प्राकृतिक आपदाएं कब और कैसे आ जाएं, इसका कोई अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। आज आलू किसानों की यही हालत है। किसानों ने प्रशासन से मांग की है कि फसल नुकसान का आकलन कर उन्हें उचित मुआवजा दिया जाए, ताकि वे इस संकट से उबर सकें।


