राजनीति और कूटनीति की दुनिया को अक्सर पूर्व-निर्धारित औपचारिकताओं, तयशुदा मुस्कानों और स्क्रिप्टेड संवादों के लिए जाना जाता है। लेकिन द यरूशलेम पोस्ट के मुख्य संपादक ज्विका क्लेन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अपनी मुलाकात को इस पारंपरिक ढांचे से बिल्कुल अलग बताया है। अपने हालिया लेख में क्लेन ने किंग डेविड होटल के सुइट में हुई मुलाकात और इजरायली संसद में मोदी के भाषण का विस्तार से वर्णन किया।
क्लेन ने अपने लेख की शुरुआत एक छोटे लेकिन प्रभावशाली प्रसंग से की। उन्होंने लिखा कि 1.4 अरब लोगों के नेता को अपनी कलम देने से पहले उन्होंने उसे नोटबुक पर चलाकर जांचा कि स्याही ठीक से चल रही है या नहीं। लेकिन जब उन्होंने वह कलम मोदी को सौंपी, तो मोदी ने उस पर नजर डाले बिना सीधे उनकी आंखों में देखा। क्लेन के मुताबिक मोदी का स्थिर आई कॉन्टैक्ट और खड़े होकर किया गया अभिवादन इस बात का संकेत था कि यह महज औपचारिक मुलाकात नहीं थी।
उन्होंने लिखा कि हाथ मिलाते समय मोदी की पकड़ मजबूत थी और सामान्य से एक पल अधिक देर तक बनी रही, मानो वे सामने वाले को यह महसूस कराना चाहते हों कि वे सचमुच संवाद में उपस्थित हैं। क्लेन के अनुसार, यह एक “प्रदर्शन” नहीं, बल्कि स्वाभाविक आत्मविश्वास का संकेत था।
मुलाकात के दौरान सुरक्षा जांच में हुई देरी के लिए मोदी ने स्वयं माफी मांगी। क्लेन ने बताया कि इजरायली सुरक्षा कर्मियों की कड़ी जांच के कारण उन्हें आशंका हो गई थी कि शायद मुलाकात रद्द हो जाए। लेकिन प्रधानमंत्री ने बातचीत की शुरुआत ही ‘सॉरी’ कहकर की, जिससे माहौल सहज हो गया। इसके बाद मोदी ने अखबार का विशेष फ्रंट पेज उठाया और खड़े-खड़े हिंदी में लिखा—“मानवता सर्वोपरि रहेगी। लोकतंत्र अमर रहेगा।”
क्लेन ने अपने लेख में उल्लेख किया कि उन्होंने अपने करियर में कई राष्ट्राध्यक्षों, राजनेताओं और सार्वजनिक हस्तियों का साक्षात्कार लिया है, जिनकी शैली अक्सर अभ्यास से तराशी हुई लगती है। लेकिन उनके अनुसार मोदी उस सांचे में फिट नहीं होते। उन्होंने लिखा कि उस सुइट में मोदी पूरी तरह “मौजूद” थे—एक दुर्लभ गुण, जो औपचारिक कूटनीति से परे जाता है।
प्रधानमंत्री का इजरायल दौरा केवल रणनीतिक और रक्षा समझौतों तक सीमित नहीं रहा। नेसेट में दिए अपने भाषण में मोदी ने भारत और इजरायल की प्राचीन सभ्यताओं के बीच गहरे सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संबंधों को रेखांकित किया। उन्होंने यहूदी अवधारणा “टिक्कुन ओलाम” की तुलना भारतीय दर्शन के “वसुधैव कुटुंबकम” से की।
इसी तरह उन्होंने यहूदी परंपरा के “हलाखा” और हिंदू अवधारणा “धर्म” के बीच समानताओं को रेखांकित किया। त्योहारों का जिक्र करते हुए उन्होंने दीवाली और हनुक्का को अंधकार पर प्रकाश की जीत का प्रतीक बताया, जबकि पुरीम और होली के बीच भी सांस्कृतिक समानताएं बताईं। क्लेन के अनुसार, यह तुलना केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि गहन बौद्धिक जुड़ाव का उदाहरण थी।
आतंकवाद के मुद्दे पर मोदी ने स्पष्ट रुख अपनाया। उन्होंने 7 अक्टूबर के हमलों को भारत के 26/11 मुंबई हमलों से जोड़ा और कहा कि निर्दोषों की हत्या को कोई भी कारण उचित नहीं ठहरा सकता। क्लेन ने इसे भाषण का सशक्त और स्पष्ट संदेश बताया।
भाषण का सबसे भावनात्मक क्षण वह था जब मोदी ने इजरायल में कार्यरत भारतीय कामगारों और देखभालकर्ताओं का जिक्र किया, जिन्होंने संकट के समय लोगों की मदद की। उन्होंने तल्मूड का हवाला देते हुए कहा—“जो एक जीवन बचाता है, वह पूरी दुनिया बचाता है।” क्लेन के अनुसार, यह बयान दोनों देशों के संबंधों को मानवीय आधार पर परिभाषित करता है।
क्लेन ने यह भी उल्लेख किया कि मोदी ने इजरायल की संसद में यह कहा कि यहूदी समुदाय सदियों तक भारत में बिना उत्पीड़न के सुरक्षित रहा। इसे उन्होंने भारत के लिए गर्व का विषय बताया। अपने लेख के अंत में क्लेन ने लिखा कि मोदी उन नेताओं में से हैं जो औपचारिक हस्ताक्षरों से आगे बढ़कर इतिहास, दर्शन और मानवीय मूल्यों के आधार पर रिश्तों को परिभाषित करते हैं—ऐसे रिश्ते जो कूटनीति से पहले ही इतिहास में दर्ज हो चुके होते हैं।


