फर्रुखाबाद: कोतवाली फतेहगढ़ में दर्ज मुकदमा संख्या 274 अब केवल एक आपराधिक प्रकरण भर नहीं रह गया है, बल्कि यह जिला पुलिस की कार्यशैली, राजनीतिक दबाव और न्यायिक हस्तक्षेप के सवालों के केंद्र में आ खड़ा हुआ है। मामले में हाईकोर्ट की दखल के बाद पुलिस प्रशासन की भूमिका पर गंभीर चर्चाएं शुरू हो गई हैं।
सूत्रों के अनुसार, इस प्रकरण में आरोपी के रूप में नामित एक नॉन-प्रैक्टिसिंग अधिवक्ता अवधेश मिश्रा के खिलाफ कार्रवाई को लेकर पुलिस का रुख बाद में नरम बताया जा रहा है। यह भी कहा जा रहा हैं कि आरोपी को एक स्थानीय सजातीय ताकतपूर्ण जनप्रतिनिधि का संरक्षण भी प्राप्त है , जिसके चलते जिला स्तर पर कार्रवाई प्रभावित हो गई । हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हो सकी है।
मामले में जब कई भ्रामक याचिका के माध्यम से इलाहाबाद हाई कोर्ट का दरवाजा अपराधी द्वारा खटखटाया गया, तब न्यायिक स्तर पर कड़ी टिप्पणियों और व्यक्तिगत दखल के बाद जिला पुलिस की सक्रियता मज़बूरी में निष्क्रिय हुईं । बताया जाता है कि चार्जशीट दाखिल करने में देरी और पैरवी में ढिलाई को लेकर लोग और पीड़ित हाई कोर्ट के आगे कुछ भी बोलने मे मजबूर हो गए ।
हाईकोर्ट की दखल के बाद जिला पुलिस की स्थिति असहज बताई जा रही है। चर्चाएं हैं कि चार्जशीट दाखिल करने से भी परहेज किया गया, जिससे वादी पक्ष में असंतोष गहराया। जिले की पुलिस अधीक्षक के स्तर पर भी इस मामले की समीक्षा हुई। सूत्र बताते हैं कि न्यायालय की सख्ती के बाद प्रशासनिक स्तर पर बैकफुट की स्थिति बनी। हालांकि पुलिस की ओर से आधिकारिक रूप से यह कहा जा रहा है कि जांच विधिसम्मत प्रक्रिया के तहत की जा रही है और किसी प्रकार का बाहरी दबाव स्वीकार्य नहीं है।
मुकदमे के वादी अजय चौहान और उनके करीबियों की ओर से भी अब सक्रियता कम होती दिखाई दे रही है। जानकारों का कहना है कि पैरवी करने वाले लोग खुद को भयभीत महसूस कर रहे हैं। कुछ गवाह ही उलटे कानूनी पेंच फंसते देख पुलिस के बिपरीत हो रहे हैं , जिससे पूरे प्रकरण में नया मोड़ आ सकता है। इस घटनाक्रम ने यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या जिला स्तर पर प्रभावशाली लोगों के दबाव में निष्पक्ष जांच प्रभावित हो चुकी है?
सूत्रों के अनुसार, मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए शासन स्तर पर बड़े अधिकारियों ने रिपोर्ट तलब की है। संकेत हैं कि नए उच्चाधिकारी इस प्रकरण की मॉनिटरिंग कर रहे हैं और आवश्यक दिशा-निर्देश जारी किए जा सकते हैं। सरकार बार-बार ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति की बात करती रही है। ऐसे में यह मामला प्रशासनिक प्रतिबद्धता की कसौटी बन सकता है।


