शरद कटियार
लोक संस्कृति (Folk culture) को लेकर हमारी समझ अक्सर सतही होती है। आमतौर पर इसे सिर्फ़ मनोरंजन या सामूहिक उत्सव मान लिया जाता है। लेकिन इतिहास गवाही देता है कि लोक संस्कृति कभी भी तटस्थ नहीं रही। यह हमेशा सत्ता, जाति और वर्ग के संघर्षों (struggle) से गढ़ी और बदली जाती रही है। ज्योतिबा फुले ने जब 1873 में सत्यशोधक समाज बनाया तो उसके जलसे महज़ सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं थे। यह लोक शिक्षा और जाति-विरोधी संघर्ष का हथियार थे। लोकगीतों, पवाड़ों और तमाशे की परंपरा को बदलकर उन्होंने ऐसे मंच गढ़े जिन पर दहेज, विधवा विवाह, शिक्षा और शेतजी-भटजी के शोषण पर चोट की जाती थी। यह दिखाता है कि लोक मंच जनता की चेतना का सबसे सशक्त माध्यम बन सकता है।
उसी दौर में लोकमान्य तिलक ने सार्वजनिक गणेशोत्सव की शुरुआत की। उन्होंने इसे हिंदू एकता और राष्ट्रवाद का औजार बनाया। मेले की मंडलियाँ हथियारबंद सैनिकों के रूप में मार्च करतीं, गीतों में स्वदेशी और मुस्लिम-विरोध गूंजता। यह साफ है कि गणेश मेला सिर्फ धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि सत्ता-संग्रह का नया माध्यम था।
यहाँ दो तस्वीरें उभरती हैं, एक ओर सत्यशोधक जलसे, जो जातिगत भेदभाव तोड़ने का प्रयास कर रहे थे।दूसरी ओर गणेश मेला, जो ब्राह्मणवादी राष्ट्रवाद को गढ़ रहा था। 1920 के दशक में गैर-ब्राह्मण युवाओं ने छत्रपति मेला खड़ा किया। इसमें शिवाजी को बहुजन नायक के रूप में पुनर्परिभाषित किया गया। तिलक की मूर्ति पर खर्च का मज़ाक उड़ाने वाला गीत “नकटा बाज़ार” बेहद लोकप्रिय हुआ। ब्राह्मण मेलों द्वारा स्त्रियों पर की गई टिप्पणियों का सीधा जवाब भी इसी मंच से दिया गया।
छत्रपति मेला ने यह साबित किया कि लोक संस्कृति सत्ता-समर्थन ही नहीं, सत्ता-विरोध का भी औजार बन सकती है। आज पुणे फेस्टिवल में सब कुछ है – लावणी, भरतनाट्यम, बैलगाड़ी दौड़, पॉप म्यूजिक और पर्यटन। इसे “सांस्कृतिक विरासत” के नाम पर बेचा जाता है, पर हकीकत यह है कि अब लोक संस्कृति पूँजी और राजनीति दोनों का खेल बन चुकी है।
लोक संस्कृति सिर्फ लोकमनोरंजन नहीं, बल्कि समाज की असल राजनीति का आईना है। सत्यशोधक जलसे ने जाति-भेद मिटाने का सपना दिखाया, गणेश मेला ने धार्मिक राष्ट्रवाद को हवा दी और छत्रपति मेला ने बहुजन अस्मिता को स्वर दिया। आज भी हमें यह समझना होगा कि जब कोई उत्सव या मेला होता है तो उसके पीछे केवल रंग-रौनक नहीं होती, बल्कि सत्ता की गहरी राजनीति भी छुपी होती है।
शरद कटियार
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