प्रशांत कटियार
लोकतंत्र की सेहत इस बात पर निर्भर करती है कि उसकी संस्थाएं कितनी ईमानदारी से अपना काम कर रही हैं। सत्ता का काम शासन करना है, न्यायपालिका का काम न्याय देना है और मीडिया का काम जनता की आवाज़ बनना है। लेकिन जब मीडिया ही सत्ता के गलियारों में प्रशस्ति गान में व्यस्त हो जाए, तो लोकतंत्र की रीढ़ कमजोर होने लगती है। निंदक निरे राखिए की सीख हमें यही बताती है कि आलोचना तात्कालिक रूप से भले चुभे, लेकिन दीर्घकाल में वही व्यवस्था को सशक्त बनाती है। दुर्भाग्य से आज आलोचना को दुश्मनी और सवाल पूछने को देशद्रोह की तरह पेश किया जा रहा है।
आज का बड़ा सवाल यह है कि क्या मीडिया सच में जनता की समस्याएं सरकार तक पहुंचा रही है, गांव की टूटी सड़कें, अस्पतालों की बदहाली, बेरोजगार युवाओं की हताशा, किसानों की लागत और उपज का अंतर ये मुद्दे प्राइम टाइम की सुर्खियां क्यों नहीं बनते, क्यों कैमरे उन स्थानों तक कम पहुंचते हैं जहां जनता की पीड़ा है, और अधिक वहां पहुंचते हैं जहां सत्ता का महिमामंडन हो रहा होता है, यदि मीडिया जनता और सरकार के बीच सेतु है, तो यह सेतु कहीं एकतरफा तो नहीं हो गया,सबसे चिंताजनक पहलू है नेताओं की संपत्ति का प्रश्न। चुनाव से पहले और चुनाव के बाद दाखिल किए गए शपथपत्रों में संपत्ति का अंतर अक्सर चौंकाने वाला होता है।
कुछ वर्षों में संपत्ति दिन दूनी, रात चौगुनी कैसे हो जाती है, क्या यह केवल व्यवसायिक कुशलता है, पारिवारिक विरासत है, या फिर व्यवस्था की खामियों का लाभ, इन सवालों पर ठोस, तथ्यात्मक और निर्भीक जांच पड़ताल क्यों नहीं दिखाई देती, खोजी पत्रकारिता, जो कभी मीडिया की पहचान थी, आज अपवाद क्यों बन गई है,मीडिया का एक बड़ा वर्ग अब प्रवक्ता की भूमिका में दिखाई देता है। बहसें तथ्यों से अधिक शोर पर आधारित हैं। सवाल कम, निष्कर्ष पहले तय। आलोचकों को खलनायक बना देना आसान है, लेकिन यही प्रवृत्ति लोकतंत्र को खोखला करती है। सत्ता से सवाल पूछना शत्रुता नहीं, बल्कि संवैधानिक जिम्मेदारी है। जो मीडिया केवल प्रशंसा दिखाए और असहमति को दबाए, वह जनता के भरोसे के साथ न्याय नहीं कर रही।
यह भी सच है कि हर मीडिया संस्थान एक जैसा नहीं है। आज भी कई पत्रकार जोखिम उठाकर सच सामने ला रहे हैं। लेकिन समग्र वातावरण ऐसा बन गया है जहां विज्ञापन, दबाव और राजनीतिक निकटता संपादकीय स्वतंत्रता पर भारी पड़ते दिखते हैं। जब आर्थिक निर्भरता बढ़ती है, तो संपादकीय साहस घटता है और सबसे बड़ी कीमत चुकाती है जनता।
लोकतंत्र में निंदक की जगह सम्मानित होनी चाहिए, क्योंकि वही आईना दिखाता है। सरकारों को भी यह समझना होगा कि आलोचना शत्रुता नहीं, सुधार का अवसर है।
और मीडिया को आत्ममंथन करना होगा कि वह इतिहास में किस रूप में याद की जाएगी सत्ता की छाया के रूप में या जनता की आवाज़ के रूप में।यदि मीडिया सच में चौथा स्तंभ है, तो उसे मजबूत खड़ा रहना होगा, झुककर नहीं। जनता की समस्याओं को सत्ता तक पहुंचाना, नेताओं की संपत्ति और निर्णयों पर पारदर्शी प्रश्न उठाना और निर्भीक जांच करना यही पत्रकारिता का धर्म है। चापलूसी से तात्कालिक लाभ मिल सकता है, लेकिन दीर्घकाल में वही विश्वसनीयता को खत्म कर देता है। लोकतंत्र को निंदक चाहिए, दरबारी नहीं।


