गुमनामी में खोये सितारे पार्ट-1
दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ के.एल. राहुल बने कप्तान, जबकि जिम्बाब्वे में नाबाद अर्धशतक जमाने वाला प्रतिभाशाली बल्लेबाज यादों से हुआ गायब
सूर्या अग्निहोत्री
डबल डेब्यू की कहानी, लेकिन दो अलग सफर
भारतीय क्रिकेट में कई ऐसे खिलाड़ी हुए हैं जिनके करियर की शुरुआत चमकदार रही, लेकिन आगे मौका न मिलने के कारण वे पहचान की रोशनी से दूर होते चले गए। 2016 की जिम्बाब्वे सीरीज़ भी ऐसी ही दो कहानियों की जन्मस्थली बनी—एक ओर के.एल. राहुल (KL Rahul) जो आज टीम इंडिया की कमान संभाल रहे हैं, और दूसरी ओर फैज़ फ़ज़ल (Faiz Fazal), जिनका नाम अब शायद ही कोई याद करता है।
राहुल का सफर रफ्तार से आगे बढ़ा
जिम्बाब्वे दौरे पर राहुल ने अंतरराष्ट्रीय वनडे क्रिकेट में डेब्यू किया और पहले ही मैच में शतक जमाकर इतिहास रच दिया। इसके बाद राहुल ने सभी फॉर्मेट में खुद को साबित किया और धीरे-धीरे टीम इंडिया की अहम जरूरत बन गए।
आज वे न केवल तीनों फॉर्मेट के स्थापित बल्लेबाज हैं, बल्कि इस बार दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ भारतीय टीम की कप्तानी भी करते नजर आए और अपनी कप्तानी में भारत को 2-1 से सीरीज जिताई।
वहीं फैज़ फ़ज़ल ने भी की थी शानदार शुरुआत
दूसरी ओर फैज़ फ़ज़ल ने भी उसी सीरीज में अपने वनडे करियर की शुरुआत की थी। डेब्यू मुकाबले में उन्होंने नाबाद 55 रन की दमदार पारी खेलकर भारत को जीत दिलाने में अहम भूमिका निभाई थी। उनकी तकनीक, शॉट सिलेक्शन और शांति से खेली गई पारी की काफी तारीफ हुई, लेकिन इसके बाद उन्हें भारत के लिए दोबारा खेलने का मौका नहीं मिला।
घरेलू क्रिकेट में दिग्गज, इंटरनेशनल में ‘वन-मैच खिलाड़ी’
फैज़ फ़ज़ल भारतीय घरेलू क्रिकेट के सबसे अनुभवी और भरोसेमंद बल्लेबाजों में गिने जाते रहे।
उन्होंने प्रथम श्रेणी क्रिकेट में 9184 से अधिक रन बनाए, जिसमें 24 शतक और 39 अर्धशतक शामिल हैं।
विदर्भ टीम के लिए उनकी भूमिका बेहद अहम रही, और दो रणजी ट्रॉफी खिताबों में उनका योगदान निर्णायक माना जाता है।
21 साल के करियर का नागपुर में हुआ अंत
फरवरी 2024 में उन्होंने नागपुर के वीसीए स्टेडियम में अपने प्रोफेशनल क्रिकेट करियर को अलविदा कह दिया।
यह वही मैदान था जहां उन्होंने अपना सफर शुरू किया था। फैज़ ने स्वीकार किया कि भारतीय टीम में उन्हें लंबा मौका नहीं मिल सका, लेकिन घरेलू स्तर पर मिले स्नेह और सम्मान ने करियर को सार्थक बनाया।
अब कहां हैं फैज़ फ़ज़ल?
सक्रिय प्रोफेशनल क्रिकेट से संन्यास लेने के बाद फैज़ फ़ज़ल क्रिकेट से पूरी तरह दूर नहीं हुए।
2024 में उन्हें लेजेंड्स लीग क्रिकेट (LLC) में खेलने के लिए चुना गया और लगभग 25 लाख रुपये का करार मिला।
फैज़ ने संकेत दिया है कि आगे वे कोचिंग, मेंटरिंग और युवा खिलाड़ियों को मार्गदर्शन देने की भूमिका में दिखाई दे सकते हैं।
किस्मत और मौकों का फर्क
राहुल और फैज़—दोनों ने एक ही सीरीज से कदम रखा, लेकिन दोनों की राहें पूरी तरह अलग रहीं।
राहुल को अवसरों की निरंतरता मिली, जबकि फ़ज़ल एक शानदार शुरुआत के बाद भी चयनकर्ताओं की निगाहों में दोबारा जगह नहीं बना सके। भारतीय क्रिकेट में यह पहली बार नहीं है जब किसी प्रतिभाशाली खिलाड़ी का करियर एक मैच तक सीमित रह गया हो।
आज भी फैज़ फ़ज़ल को याद करते हैं क्रिकेट प्रेमी
जिम्बाब्वे के खिलाफ उनकी नाबाद पारी आज भी उन प्रशंसकों की स्मृतियों में दर्ज है जो तकनीकी तौर पर मजबूत बल्लेबाजी को समझते हैं। फ़ज़ल का शांत स्वभाव और खेल के प्रति समर्पण उन्हें खास बनाता रहा।
फैज़ खुद कहते हैं—“पछतावा नहीं, बस एक और मौका मिलता”
संन्यास के समय फैज़ ने कहा था कि उन्हें किसी बात का अफसोस नहीं, लेकिन हां—यह जरूर महसूस होता है कि उन्हें दोबारा भारत के लिए खेलने का अवसर मिलता तो शायद कहानी अलग होती।
दो करियर, दो मंज़िलें—एक ही शुरुआत से
जहां आज के.एल. राहुल विदेशी धरती पर भारतीय टीम की अगुवाई करते हैं, वहीं उसी दौर में डेब्यू करने वाला एक प्रतिभाशाली बल्लेबाज अपने संघर्ष, समर्पण और प्रदर्शन के बावजूद गुमनामी की परतों में ढका हुआ है।
फैज़ की कहानी भारतीय क्रिकेट की असलियत भी है
उनकी यात्रा बताती है कि भारतीय क्रिकेट में अवसर मिलना और अवसर को दोहराया जाना—दो अलग बातें हैं।
फैज़ फ़ज़ल जैसे कई खिलाड़ी हैं जो घरेलू क्रिकेट के धुरी होते हुए भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान नहीं पा सके।
आगे की राह
फैज़ अब नई भूमिका में क्रिकेट को जीना चाहते हैं। युवा क्रिकेटरों को तकनीक, मानसिक मजबूती और पेशेवर दृष्टिकोण सिखाना उनकी प्राथमिकता बन सकती है।
फैज़ फ़ज़ल भले ही अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में सिर्फ एक मैच के खिलाड़ी रहे हों, लेकिन उनकी कहानी भारतीय घरेलू क्रिकेट की मेहनत, जज्बे और स्थिरता का प्रतीक है। उनका सफर बताता है कि हर चमकता सितारा आसमान में नहीं होता—कुछ जमीन पर मेहनत की धूप में दमकते हैं।





