प्रशांत कटियार
नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद अयोध्या में जिस तेज़ी से बाबरी मस्जिद की ज़मीन पर राम मंदिर का निर्माण हुआ, उसने भारतीय जनता पार्टी के समर्थकों के बीच एक गहरे विश्वास को जन्म दिया। यह विश्वास कि मोदी के रहते हिंदू धर्म (Religion) सुरक्षित है और “हिंदू जाग चुका है”। लेकिन इस धारणा के भीतर झांकें तो कई असहज सवाल सामने आते हैं—आख़िर हिंदू कब सोया हुआ था? और धर्म को वास्तविक ख़तरा कब था? यदि धर्म सचमुच संकट में होता, तो भारत में हिंदू आबादी आज भी बहुसंख्यक कैसे होती?
यहीं से धर्म और राजनीति की वह उलझन शुरू होती है, जिसमें आम जनता की आस्था फंसकर रह गई है। धर्म को राजनीतिक औज़ार बनाकर प्रस्तुत किया गया, लेकिन जब उसी धर्म और उसके प्रतीकों का बार-बार अपमान हुआ, तो तथाकथित जागा हुआ हिंदू समाज असमंजस में दिखा—उसे समझ ही नहीं आया कि विरोध करे या चुप रहे।
बीते समय में हमने देखा कि कभी प्रधानमंत्री को शिवजी की तरह डमरू बजाते दिखाया गया, तो कभी हनुमानजी को पतंगबाज़ी के प्रतीक की तरह इस्तेमाल किया गया। इन घटनाओं पर बड़े पैमाने पर कोई आपत्ति नहीं उठी। लेकिन जब उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय ने लखनऊ में हनुमान चालीसा का पाठ करने का प्रयास किया और पुलिस ने उन्हें रोका, तब भी कोई बड़ा हिंदुत्ववादी संगठन उनके समर्थन में सामने नहीं आया। यह दोहरा मापदंड साफ़ करता है कि धर्म का सवाल यहां आस्था का नहीं, बल्कि राजनीति का है।
जो लोग मस्जिदों या चर्चों के सामने हनुमान चालीसा पढ़ने को धर्मरक्षा मानते हैं, उन्हें इस बात से कोई आपत्ति नहीं हुई कि एक मंदिर में ही हनुमान चालीसा के पाठ को रोका गया। इससे यह संदेश जाता है कि भाजपा के लिए धर्म आस्था नहीं, बल्कि सत्ता तक पहुंचने की सीढ़ी बन चुका है। आस्था के सम्मान से अधिक, उसका राजनीतिक उपयोग प्राथमिकता बन गया है।
यह प्रवृत्ति केवल धार्मिक प्रतीकों तक सीमित नहीं है, बल्कि देश की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत तक फैल चुकी है। सोमनाथ मंदिर पर हुए आक्रमण के हजार साल पूरे होने पर प्रधानमंत्री ने इसे “विजय का प्रतीक” बताया, क्योंकि मंदिर को पूरी तरह नष्ट नहीं किया जा सका। लेकिन दूसरी ओर, उनके ही संसदीय क्षेत्र वाराणसी में जीर्णोद्धार और सौंदर्यीकरण के नाम पर सदियों पुरानी विरासत को नुकसान पहुंचाया जा रहा है।
मणिकर्णिका घाट, जिसे हिंदू धर्म के सबसे पवित्र और प्राचीन श्मशान घाटों में गिना जाता है, भी इस प्रक्रिया से अछूता नहीं रहा। मोक्ष की कामना लेकर आने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह स्थान केवल एक घाट नहीं, बल्कि आस्था का केंद्र है। लेकिन पुनरुद्धार के नाम पर यहां बुलडोज़र चलाए गए, पुरानी मूर्तियों और संरचनाओं को तोड़ा गया। जब विरोध हुआ तो प्रशासन ने सफ़ाई दी कि मूर्तियों को सुरक्षित रख लिया गया है और बाद में पुनः स्थापित किया जाएगा। सवाल यह है कि अगर विरासत इतनी ही महत्वपूर्ण थी, तो शुरुआत से ही सावधानी क्यों नहीं बरती गई?
काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के निर्माण के समय भी छोटे-बड़े कई मंदिर और प्राचीन मूर्तियां नष्ट हुईं। अब अहिल्याबाई होलकर की लगभग सौ वर्ष पुरानी मूर्ति को नुकसान पहुंचने का मामला सामने आया। यही अहिल्याबाई होलकर थीं, जिन्होंने मणिकर्णिका घाट का पुनरुद्धार कराया और कई मंदिरों का संरक्षण किया। यह विडंबना नहीं तो और क्या है कि जिनकी विरासत को सहेजने का दावा किया जाता है, उसी को विकास के नाम पर मिटाया जा रहा है।
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री से तीखे सवाल किए हैं। उन्होंने पूछा है कि क्या जीर्णोद्धार और सौंदर्यीकरण विरासत को बचाते हुए नहीं किया जा सकता था? उन्होंने संसद परिसर से गांधी और आंबेडकर की प्रतिमाओं को एक कोने में रखे जाने और जलियांवाला बाग के पुनरुद्धार में इतिहास के साथ हुए खिलवाड़ का भी ज़िक्र किया।
खड़गे का सवाल सीधा है—क्या विकास का मतलब इतिहास, संस्कृति और आस्था की बलि देना है? क्या बनारस के घाटों को व्यावसायिक हितों के लिए आम जनता से दूर किया जा रहा है? क्या “मां गंगा ने बुलाया है” कहने वाले प्रधानमंत्री आज उसी गंगा और उससे जुड़ी विरासत को भूल चुके हैं?
यह तय है कि इन सवालों के सीधे जवाब शायद कभी नहीं मिलेंगे। लेकिन लोकतंत्र में सवाल पूछते रहना ज़रूरी है। क्योंकि जब जीर्णोद्धार के नाम पर करोड़ों का खेल होता है, तो फायदा कुछ खास लोगों को मिलता है, जबकि नुकसान देश की साझा विरासत को होता है। कुंभ मेले से लेकर ऐतिहासिक घाटों तक, आस्था का बाज़ारीकरण लगातार बढ़ रहा है।
अहिल्याबाई होलकर की मूर्ति को नुकसान पहुंचने पर इंदौर के ट्रस्ट और होलकर वंशजों का विरोध इसी चिंता का प्रतीक है। विकास के नाम पर इतिहास और आस्था की बलि को उन्होंने राष्ट्रीय गौरव का अपमान बताया। यह चेतावनी है कि अगर अब भी नहीं रुका गया, तो आने वाली पीढ़ियों को केवल नए निर्माण मिलेंगे, लेकिन अपनी जड़ों से जुड़ी स्मृतियां नहीं।
धर्म, संस्कृति और इतिहास किसी एक दल या सरकार की बपौती नहीं हैं। इनके साथ खिलवाड़ केवल राजनीतिक लाभ के लिए किया गया, तो उसका नुकसान पूरे समाज को उठाना पड़ेगा। अब सवाल यह नहीं है कि कौन सा धर्म सुरक्षित है, बल्कि यह है कि क्या हमारी आस्था, विरासत और इतिहास वास्तव में सुरक्षित हैं?


