लखनऊ
आगामी विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं और इसी के साथ विभिन्न दलों ने अपने-अपने वोट बैंक को मजबूत करने की रणनीति पर काम शुरू कर दिया है। इसी क्रम में अब निषाद समाज एक बार फिर सियासी केंद्र में आ गया है। प्रदेश की राजनीति में प्रभावशाली माने जाने वाले इस वर्ग को साधने के लिए भारतीय जनता पार्टी और समाजवादी पार्टी समेत अन्य दल सक्रिय नजर आ रहे हैं।
राजधानी लखनऊ से मिल रही राजनीतिक हलचलों के अनुसार, भाजपा द्वारा साध्वी निरंजन ज्योति को राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग का अध्यक्ष बनाए जाने और समाजवादी पार्टी द्वारा रुक्मणी निषाद को महिला सभा का प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किए जाने के पीछे निषाद समाज को साधने की रणनीति देखी जा रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन नियुक्तियों के जरिए दोनों प्रमुख दल इस समाज को अपने पक्ष में लाने का प्रयास कर रहे हैं।
निषाद समाज की राजनीतिक ताकत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि प्रदेश की लगभग 140 विधानसभा सीटों पर इनका सीधा प्रभाव माना जाता है। इन सीटों पर 60 हजार से लेकर 1.20 लाख तक निषाद मतदाता मौजूद हैं, जो चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। इतना ही नहीं, करीब 23 लोकसभा सीटों पर भी निषाद समाज की आबादी एक से तीन लाख के बीच बताई जाती है, जिससे इनकी राजनीतिक अहमियत और बढ़ जाती है।
पूर्वांचल और पूर्वी उत्तर प्रदेश के जिलों जैसे गोरखपुर, मऊ, गाजीपुर, बलिया, संत कबीर नगर, मिर्जापुर, भदोही, प्रयागराज, वाराणसी और जौनपुर में निषाद समाज की मजबूत उपस्थिति है। इसके अलावा प्रदेश के अन्य हिस्सों में भी यह समाज प्रभावशाली स्थिति में है। यही कारण है कि कोई भी राजनीतिक दल इस वोट बैंक को नजरअंदाज करने का जोखिम नहीं उठाना चाहता।
राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, निषाद समाज की सबसे बड़ी मांग उनकी जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने की रही है। जो भी दल इस मांग को लेकर सकारात्मक रुख अपनाता है, उसे इस समाज का समर्थन मिलने की संभावना बढ़ जाती है। ऐसे में चुनाव नजदीक आते ही इस मुद्दे के फिर से प्रमुखता से उभरने के संकेत मिल रहे हैं।
प्रदेश में डॉ. संजय निषाद के नेतृत्व वाली निषाद पार्टी की भी इस वर्ग में अच्छी पकड़ मानी जाती है। 2022 के विधानसभा चुनाव में इस पार्टी ने भाजपा के साथ गठबंधन कर कई सीटों पर चुनाव लड़ा था और उल्लेखनीय सफलता हासिल की थी। हालांकि 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को अपेक्षित सफलता नहीं मिली, लेकिन संगठन की जमीनी पकड़ अभी भी मजबूत मानी जा रही है।
इसके अलावा बिहार के मुकेश सहनी भी निषाद और मल्लाह समाज की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाते रहे हैं और उत्तर प्रदेश की राजनीति में भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराने की कोशिश करते रहे हैं। हालांकि यूपी में उन्हें अपेक्षित समर्थन नहीं मिल पाया।
कुल मिलाकर, उत्तर प्रदेश की राजनीति में निषाद समाज एक बार फिर निर्णायक भूमिका में नजर आ रहा है। चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आएंगे, वैसे-वैसे इस समाज को लेकर राजनीतिक गतिविधियां और तेज होने की संभावना है, जिससे प्रदेश की सियासत में नए समीकरण बनते दिख सकते हैं।


