यूथ इंडिया संवाददाता
फर्रुखाबाद/लखनऊ। एस.के.एम. इंटर कॉलेज और कृष्णा पब्लिक स्कूल (पूर्व सनराइज पब्लिक स्कूल) की मान्यता में भारी जालसाजी, फर्जी दस्तावेज और भूमि हेराफेरी सामने आने के बाद अब शिक्षा विभाग के बड़े अधिकारियों की मुश्किलें बढऩे वाली हैं। मामला केवल मान्यता फ्रॉड का नहीं, बल्कि कानून, शासनादेश, हाईकोर्ट आदेश और इंटरमीडिएट शिक्षा अधिनियम 1921 के खुले उल्लंघन का है।
सबसे बड़ा खुलासा यह है कि डीएम फर्रुखाबाद द्वारा कराई गई 2020 की मजिस्ट्रेट स्तरीय जांच, जिसमें जालसाजी साबित हुई थी और जिसे बाद में माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद ने भी वैध और संवैधानिक माना, उसी जांच को माध्यमिक शिक्षा निदेशालय के अधिकारियों ने दबाकर 2023 में एक ,नयी जांच, बनाकर दोषी प्रबंधक अवधेश मिश्रा को क्लीन चिट देने की कोशिश की।
जांच रिपोर्टों के अनुसार इंटर कॉलेज की मान्यता जाली दस्तावेजों से ली गई, इंटर कॉलेज के नाम कोई भूमि दर्ज नहीं थी, जो जमीन सनराइज/कृष्णा पब्लिक स्कूल की थी, उसी पर फर्जी तरीके से इंटरमीडिएट मान्यता भी ले ली गई। लेखपाल और राजस्व निरीक्षक की रिपोर्ट में गाटा संख्या और कब्जे में भारी अंतर साबित हुआ। एसडीएम ने अपनी आख्या में लिखित रूप से बताया कि यह मामला स्पष्ट रूप से भूमि फर्जीवाड़े और भू-माफियागिरी का है। बेसिक शिक्षा अधिकारी की रिपोर्ट में 10 और 100 के नोटरी शपथपत्र पर गैर-पंजीकृत किरायानामा लगाकर मान्यता लेने की बात सामने आई, जबकि शासनादेश के अनुसार 10 वर्ष का पंजीकृत किरायानामा अनिवार्य है। यह नियम इंटरमीडिएट शिक्षा अधिनियम 1921 की धारा 16-ड (16-डी) और 16-घ (16-॥) के प्रावधानों के सीधे उल्लंघन में आता है, जिनके अनुसार जाली कागजों, गलत तथ्यों और धोखाधड़ी से प्राप्त मान्यता को तत्काल प्रभाव से रद्द किया जा सकता है।
उच्च न्यायालय ने 17 जनवरी 2022 को दिए गए आदेश में यह साफ कहा था कि प्रबंधक चार सप्ताह के भीतर दस्तावेज शिक्षा निदेशक को दें और निदेशक 12 सप्ताह में कानून के अनुसार निर्णय लें। लेकिन इसके विपरीत प्रबंधक अवधेश मिश्रा ने अदालत को भ्रमित करते हुए दूसरी याचिका दाखिल की और शिक्षा निदेशन, डीआईओएस, बीएसए की त्रिमूर्ति ने कानून और हाईकोर्ट के स्पष्ट आदेशों को तिलांजलि देते हुए 2023 में ,दूसरी जांच, गठित कर दी। यह जांच न तो राजस्व अभिलेखों पर आधारित थी, न स्थलीय निरीक्षण पर, न ही 2020 की आधिकारिक जांच रिपोर्ट को संज्ञान में लिया गया। संदेह की पुष्टि इस बात से होती है कि डीआईओएस नरेंद्र पाल सिंह, लिपिक राजीव यादव और पूर्व लिपिक राजेश अग्निहोत्री की भूमिका उजागर हो रही है कि उन्होंने प्रबंधक को अवैध लाभ पहुंचाने के लिए फाइलों में खेल किया।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह पूरा कृत्य न केवल इंटरमीडिएट शिक्षा अधिनियम 1921 की धारा 16-॥, 16-ष्ठ का उल्लंघन है, बल्कि भारतीय दंड संहिता की धारा 420 (धोखाधड़ी), 468 (कूटरचना), 471 (फर्जी दस्तावेज का प्रयोग), 409 (अपराधिक विश्वासभंग) के तहत भी संज्ञेय अपराध बनता है। किसी भी अधिकारी द्वारा सत्यापित, वैध और शासन व न्यायालय से प्रमाणित जांच रिपोर्ट को दरकिनार कर नई जांच कर लाभ देना कानून की दृष्टि में दुरुपयोग, पद के दायित्वों का उल्लंघन और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के अंतर्गत दंडनीय है।
अब पूरे प्रकरण में माध्यमिक शिक्षा निदेशक, डीआईओएस फर्रुखाबाद और बीएसए की भूमिका सवालों के घेरे में है। इनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की संभावना बन रही है क्योंकि हाईकोर्ट से लेकर शासन तक जिस जांच को मान्य किया जा चुका है, उसे सारहीन, घोषित करना न केवल अवैध है बल्कि न्यायालय की अवमानना का भी विषय है।
यदि अब भी 2020 की जांच रिपोर्ट के अनुसार कानूनी कार्रवाई नहीं की गई, मान्यता रद्द नहीं की गई, और 2023 की अवैध रिपोर्ट निरस्त नहीं की गई, तो प्रार्थी ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि वह माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद में अवमानना और भ्रष्टाचार के खिलाफ याचिका दायर करेगा, जिसकी संपूर्ण जिम्मेदारी संबंधित अधिकारियों की होगी। यह मामला अब केवल मान्यता फर्जीवाड़े का नहीं, बल्कि शिक्षा विभाग के भीतर बैठे भ्रष्ट तंत्र के खुलासे का है—जिसकी गूंज शासन और न्यायालय तक सुनाई देगी।




