शरद कटियार
लखनऊ/प्रयागराज: ज्योर्तिमठ (उत्तराम्नाय पीठ) के शंकराचार्य (Shankaracharya) पद को लेकर चल रहा विवाद केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सनातन परंपरा, (eternal tradition) मठीय व्यवस्था और संवैधानिक सीमाओं से जुड़ा गंभीर विषय है। इस पूरे प्रकरण को समझने के लिए 2022 की घटनाओं, शंकराचार्य चयन की परंपरा और न्यायपालिका की भूमिका को एक साथ देखना आवश्यक है।
सनातन धर्म में शंकराचार्य पद आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित आम्नाय परंपरा का सर्वोच्च आचार्य पद है। यह पद किसी व्यक्ति की घोषणा से नहीं, बल्कि पीठ, गुरु–शिष्य परंपरा, दशनामी संन्यास और विधिवत पट्टाभिषेक से वैधानिक होता है। उत्तर भारत की पीठ को ज्योर्तिमठ (उत्तराम्नाय) कहा जाता है, जिसका केंद्र बदरिकाश्रम माना जाता है।
इस पूरे विवाद की शुरुआत 11 सितंबर 2022 से होती है, जब ज्योर्तिमठ एवं द्वारका शारदा पीठ के शंकराचार्य रहे स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती मध्यप्रदेश के नरसिंहपुर में ब्रह्मलीन हो गए। वे कई दशकों तक शंकराचार्य परंपरा के सबसे वरिष्ठ आचार्य रहे और संत समाज में उनकी प्रतिष्ठा निर्विवाद थी। उनके ब्रह्मलीन होते ही यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से सामने आया कि उत्तराम्नाय ज्योर्तिमठ का अगला शंकराचार्य कौन होगा।
सनातन परंपरा के अनुसार, शंकराचार्य का चयन किसी सरकारी आदेश, चुनाव या प्रशासनिक प्रक्रिया से नहीं होता। इसके लिए गुरु द्वारा उत्तराधिकारी का चयन, शास्त्रों में प्रवीणता, दशनामी संन्यास परंपरा में दीक्षा और अंततः मठ में विधिवत पट्टाभिषेक आवश्यक होता है। इसी परंपरा का पालन करते हुए 12 सितंबर 2022, यानी ब्रह्मलीन होने के अगले ही दिन, बदरिकाश्रम स्थित ज्योर्तिमठ में विधिवत पट्टाभिषेक सम्पन्न हुआ। इस पट्टाभिषेक में स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के शिष्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को उत्तराम्नाय ज्योर्तिमठ का शंकराचार्य घोषित किया गया। यह समारोह वैदिक मंत्रोच्चार, दशनामी संन्यास परंपरा और संत–महात्माओं की उपस्थिति में सम्पन्न हुआ, जिसे परंपरागत और शास्त्रसम्मत माना गया।
यह भी तथ्य है कि सनातन व्यवस्था में चारों आम्नाय पीठ—ज्योर्तिमठ, द्वारका, शृंगेरी और गोवर्धन—स्वतंत्र पीठें हैं। प्रत्येक पीठ का शंकराचार्य उसी पीठ की आंतरिक परंपरा से तय होता है। इसलिए द्वारका शारदा पीठ के लिए अलग उत्तराधिकारी की घोषणा होना परंपरा के विरुद्ध नहीं है। ज्योर्तिमठ के शंकराचार्य का अधिकार केवल उत्तराम्नाय पीठ तक सीमित रहता है।
विवाद तब गहराया जब इस धार्मिक पद को लेकर प्रशासनिक नोटिस, प्रमाण-पत्र और सरकारी हस्तक्षेप की बातें सामने आईं। इसी संदर्भ में न्यायपालिका की भूमिका पर भी चर्चा हुई। उपलब्ध न्यायिक तथ्यों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने कभी भी सीधे तौर पर किसी व्यक्ति को शंकराचार्य मानने या न मानने का आदेश नहीं दिया। सर्वोच्च न्यायालय का स्पष्ट दृष्टिकोण रहा है कि धार्मिक और परंपरागत पदों के मामलों में न्यायालय तब तक हस्तक्षेप नहीं करता, जब तक कोई गंभीर संवैधानिक या वैधानिक प्रश्न सामने न आए।
पूरे प्रकरण का तथ्यात्मक सार यही है कि—11 सितंबर 2022 को स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ब्रह्मलीन हुए। 12 सितंबर 2022 को ज्योर्तिमठ में विधिवत पट्टाभिषेक सम्पन्न हुआ। परंपरा, शास्त्र और संत-स्वीकृति के अनुसार ज्योर्तिमठ के शंकराचार्य ही उस पीठ के वास्तविक और वैधानिक शंकराचार्य हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने इस विषय में किसी व्यक्ति के पक्ष या विपक्ष में कोई सीधा आदेश नहीं दिया है। सनातन परंपरा का मूल सिद्धांत यही है कि ऐसे विवादों का समाधान परंपरा, संवाद और मठीय व्यवस्था से हो, न कि प्रशासनिक या राजनीतिक दबाव से। यही इस पूरे प्रकरण की केन्द्रीय सच्चाई है।


