शरद कटियार
उत्तर प्रदेश में आगामी शिक्षक निर्वाचन 2026 की तैयारी जिस स्थिति में दिखाई दे रही है, वह न केवल चिंताजनक है बल्कि प्रशासनिक दक्षता पर गंभीर प्रश्न भी खड़े करती है। यह पहली बार नहीं है कि शिक्षक चुनाव (Teachers Elections) की मतदाता सूची चर्चा में है, किंतु इस बार जिस पैमाने पर त्रुटियाँ सामने आई हैं, वह पूरे चुनावी ढांचे की विश्वसनीयता पर खतरे की घंटी बजा रही हैं।
फर्रुखाबाद के 13 मतदान बूथों पर जारी अनंतरिम सूची में शिक्षकों के विद्यालय का नाम और पता तक दर्ज न होना कोई सामान्य तकनीकी त्रुटि नहीं कही जा सकती। यह वही जानकारी है जो शिक्षक निर्वाचन की नींव मानी जाती है। विद्यालय का नाम गायब होने का अर्थ है कि प्रत्याशी यह तक नहीं जान पाएंगे कि मतदाता किस स्कूल से संबद्ध है। यह सीधा-सीधा चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करने वाला कारक है।
चुनाव आयोग की तरफ़ से यह तर्क दिया गया कि डिजिटल प्रणाली बाधित हो गई थी। परंतु प्रश्न यह है कि क्या एक पूरे प्रदेश में—कानपुर, अग्रें, मेरठ, बरेली, शाहजहाँपुर और गोरखपुर तक—एक जैसी त्रुटियाँ महज़ किसी तकनीकी खामी का परिणाम हो सकती हैं?
यदि हाँ, तो यह तकनीक पर निर्भर हमारी प्रणाली की भयावह कमजोरी है।यदि नहीं, तो यह प्रशासनिक विफलता और लापरवाही का स्पष्ट प्रमाण है।
शिक्षक संगठनों की नाराज़गी खाली विरोध नहीं लगती। मतदाता सूची का अधूरा होना, अपूर्ण डेटा अपलोड होना, विद्यालय लिंक का गायब हो जाना और पते का न होना—ये सभी बातें चुनाव की पारदर्शिता को क्षति पहुँचाती हैं। यह स्थिति न केवल प्रत्याशियों को चुनाव-पूर्व तैयारी से रोकती है बल्कि मतदाताओं के अधिकारों को भी कमजोर करती है।
अफसोस की बात है कि ऐसी त्रुटियाँ उस राज्य में हो रही हैं जो प्रशासनिक सुधारों और तकनीकी पारदर्शिता का दावा लंबे समय से करता रहा है। चुनाव आयोग सहित सभी स्तरों पर जवाबदेही तय होना जरूरी है।
क्योंकि सवाल सिर्फ मतदाता सूची का नहीं है—सवाल लोकतंत्र की उस बुनियाद का है जिसे हम स्वयं कमज़ोर कर रहे हैं।सबसे बड़ी आवश्यकता है कि अनंतरिम सूची को पुनः सत्यापित कर संशोधित सूची जारी की जाए,जिम्मेदार अधिकारियों की पहचान हो और कार्रवाई सुनिश्चित की जाए,और यह स्पष्ट रूप से बताया जाए कि यह त्रुटि कैसे हुई और आगे इसे कैसे रोका जाएगा।शिक्षक चुनाव हमारे लोकतांत्रिक ढांचे का विशेष चरण है।
यदि उस प्रक्रिया में ही मतदाता सूची अविश्वसनीय हो जाए, तो चुनाव के परिणामों पर विश्वास कैसे होगा?यह समय है कि चुनाव आयोग इस मामले को सिर्फ तकनीकी त्रुटि न कहकर उसे व्यापक प्रशासनिक समीक्षा का हिस्सा बनाए—वरना 2026 का शिक्षक चुनाव एक गंभीर विवाद की ओर बढ़ सकता है।


