– बड़े घोटाले पर क्यों मेहरबान हैं जाँच एजेंसियां?
नई दिल्ली। देश को हिला देने वाली कार्रवाई में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने क्लाउड और डेटा सेंटर कंपनी Vuenow Infratech (जिसका नाम हाल ही में बदलकर Ikoma Technologies रखा गया) पर शिकंजा कस दिया है। पंजाब, हरियाणा और महाराष्ट्र में हुई छापेमारी में एजेंसी ने 737 करोड़ रुपये की बेहिसाब नकदी, कीमती दस्तावेज़, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और अचल संपत्तियां जब्त की हैं।
सबसे बड़ा झटका कंपनी को तब लगा जब राजस्थान के भीवाड़ी में स्थित उसका मेगा डेटा सेंटर सील कर दिया गया, जिसकी कीमत करीब 92.5 करोड़ रुपये आंकी जा रही है। साथ ही कंपनी के डायरेक्टर का डिमैट खाता भी फ्रीज कर दिया गया है।
Vuenow Infratech पहले से ही उथल-पुथल में थी। कुछ ही दिन पहले कंपनी का नाम बदला गया और दो स्वतंत्र निदेशक इस्तीफा देकर भाग खड़े हुए। ED की रेड के बाद शेयर बाज़ार में जबरदस्त हड़कंप मच गया।
कंपनी के शेयर धड़ाम से गिरे, निवेशकों ने जमकर बिकवाली की और देखते-ही-देखते स्टॉक बुरी तरह ध्वस्त हो गया।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर बड़े-बड़े कॉर्पोरेट घोटालों पर जाँच एजेंसियां हमेशा इतनी देर से क्यों सक्रिय होती हैं? छोटे कारोबारियों और आम लोगों पर तो कार्रवाई तुरंत हो जाती है, लेकिन अरबों के फ्रॉड करने वाली कंपनियों पर एजेंसियों की मेहरबानी क्यों रहती है?
क्या यह कार्रवाई सिर्फ एक दिखावा है या फिर वास्तव में कोई सख्त कदम उठाया जाएगा?
जनता पूछ रही है।क्यों समय रहते ऐसे घोटाले नहीं रोके जाते? कौन है वो ताकतवर नेटवर्क, जो सालों तक इन कंपनियों को बचाता है?
यह मामला अब सिर्फ एक कंपनी का नहीं रहा। यह पूरे डेटा सेक्टर, शेयर बाज़ार और सबसे ज़्यादा जाँच एजेंसियों की साख पर सवालिया निशान बन चुका है।
अगर इस बार भी कार्रवाई आधे रास्ते में रुक गई, तो यह देश के लिए सबसे बड़ा धोखा होगा।


