वाशिंगटन। पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच शनिवार को पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में अमेरिका, ईरान और इस्राइल से जुड़े तनाव को कम करने के लिए अहम शांति वार्ता प्रस्तावित है। इस बातचीत को क्षेत्र में जारी संघर्ष को खत्म करने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है, हालांकि इसके सफल होने को लेकर संशय भी बना हुआ है।
अमेरिका की ओर से यह वार्ता ऐसे समय में हो रही है जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि बातचीत विफल होती है तो ईरान के खिलाफ कड़ा सैन्य कदम उठाया जा सकता है। इस बयान ने कूटनीतिक प्रयासों के साथ-साथ युद्ध के खतरे को भी बढ़ा दिया है। वहीं ईरान ने भी साफ संकेत दिए हैं कि वह बिना अपनी शर्तें माने किसी समझौते के लिए तैयार नहीं है।
ईरान की ओर से संसदीय अध्यक्ष मोहम्मद बाकेर गालिबाफ के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल इस्लामाबाद पहुंच चुका है। ईरान ने वार्ता से पहले ही कई सख्त शर्तें रख दी हैं, जिनमें अमेरिकी प्रतिबंधों को हटाना, क्षेत्र से अमेरिकी सेना की वापसी, यूरेनियम संवर्धन का अधिकार और लेबनान सहित अन्य क्षेत्रों में युद्धविराम शामिल हैं। इसके अलावा ईरान ने भविष्य में अमेरिका द्वारा किसी भी सैन्य हमले से बचाव की लिखित गारंटी भी मांगी है।
वहीं अमेरिका की मांगें भी कम सख्त नहीं हैं। अमेरिका चाहता है कि ईरान अपनी परमाणु गतिविधियों को पूरी तरह बंद करे, संवर्धित यूरेनियम का भंडार अंतरराष्ट्रीय एजेंसी को सौंपे और क्षेत्रीय आतंकी संगठनों को समर्थन देना बंद करे। इसके साथ ही होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलने और मिसाइल कार्यक्रम को सीमित करने जैसी शर्तें भी रखी गई हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि दोनों देशों की कड़ी और परस्पर विरोधी शर्तों के चलते इस वार्ता का सफल होना आसान नहीं है। हालांकि यदि किसी स्तर पर सहमति बनती है, तो यह पूरे पश्चिम एशिया में शांति की दिशा में ऐतिहासिक कदम साबित हो सकता है। फिलहाल दुनिया की नजर इस अहम बैठक पर टिकी हुई है, जहां कूटनीति और टकराव के बीच संतुलन साधने की चुनौती सबसे बड़ी परीक्षा बनी हुई है।
शांति के बोल बनाम धमकी का खेल: समझौते से पहले कूटनीति की जंग तेज, कौन मारेगा बाजी


