वैश्विक मंच पर पाकिस्तान की किरकिरी: अमेरिका में प्रधानमंत्री शहबाज हाशिए पर, रक्षा मंत्री का बयान—आसिम मुनीर मेरे अधिकारी नहीं
वॉशिंगटन/नई दिल्ली।
वॉशिंगटन में आयोजित ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की पहली बैठक उस समय चर्चा का केंद्र बन गई जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर भारत और पाकिस्तान के बीच हुए सैन्य तनाव को रुकवाने का श्रेय स्वयं को दिया। अपने संबोधन में ट्रंप ने दावा किया कि यदि दोनों देश पीछे नहीं हटते तो अमेरिका कड़े व्यापारिक कदम उठाने के लिए तैयार था। उन्होंने कहा कि 200 प्रतिशत तक शुल्क लगाने की चेतावनी ने दोनों पक्षों को बातचीत की राह पर लौटने के लिए मजबूर किया।
ट्रंप ने सभा में कहा कि उन्होंने सीधे दोनों देशों के नेताओं से फोन पर बात की थी और स्पष्ट संदेश दिया था कि यदि संघर्ष जारी रहा तो अमेरिका किसी भी प्रकार का व्यापारिक समझौता आगे नहीं बढ़ाएगा। उनके अनुसार, “जब आर्थिक नुकसान और वैश्विक प्रभाव की बात सामने आई तो दोनों देशों ने संयम दिखाया।” उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि उस दौर में कई महंगे लड़ाकू विमान मार गिराए गए थे और स्थिति बेहद गंभीर हो चली थी।
बैठक के दौरान ट्रंप ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की खुलकर सराहना की। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी उनके “बेहतरीन मित्र” हैं और कठिन समय में समझदारी से निर्णय लेने की क्षमता रखते हैं। इसी क्रम में उन्होंने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ का जिक्र करते हुए कहा कि उन्होंने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि अमेरिका की पहल से “करोड़ों लोगों की जान बची।” सभा के दौरान शरीफ का मंच पर खड़े रहना भी राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना रहा।
इस बैठक में भारत ने पर्यवेक्षक देश के रूप में भागीदारी की। बताया गया कि यह मंच गाजा में युद्धविराम की निगरानी तथा युद्ध से प्रभावित क्षेत्रों के पुनर्निर्माण जैसे वैश्विक मुद्दों पर सहयोग बढ़ाने के उद्देश्य से गठित किया गया है। हालांकि, ट्रंप के भाषण का केंद्र दक्षिण एशिया का घटनाक्रम ही बना रहा।
उधर, पाकिस्तान की आंतरिक राजनीति को लेकर भी बयानबाजी तेज हो गई है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने एक साक्षात्कार में स्वीकार किया कि पाकिस्तान में सेना और सरकार “हाइब्रिड व्यवस्था” के तहत कार्य करती हैं। जब उनसे पूछा गया कि क्या सेना प्रमुख आसिम मुनीर उनके वास्तविक वरिष्ठ हैं, तो उन्होंने स्पष्ट किया कि उनके बॉस प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ही हैं। साथ ही उन्होंने यह भी माना कि पाकिस्तान के इतिहास में सेना का प्रभाव निर्णायक रहा है।
ट्रंप के ताजा दावों ने एक बार फिर इस बहस को हवा दे दी है कि भारत-पाक संबंधों में बाहरी शक्तियों की भूमिका कितनी प्रभावी रही है। जहां अमेरिका अपनी मध्यस्थता को निर्णायक बताता है, वहीं दक्षिण एशिया के जानकार मानते हैं कि किसी भी संघर्षविराम के पीछे क्षेत्रीय रणनीति, सैन्य संतुलन और कूटनीतिक संवाद की जटिल प्रक्रिया काम करती है।
फिलहाल, वॉशिंगटन की इस बैठक ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत-पाकिस्तान संबंध वैश्विक मंचों पर अब भी प्रमुख मुद्दा बने हुए हैं। ट्रंप का दोहराया गया दावा और मंच पर दिखा प्रतीकात्मक घटनाक्रम आने वाले समय में कूटनीतिक बयानबाजी को और तेज कर सकता है।


