संवाददाता – लखनऊ उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्री दिनेश खटीक की ओर से आयोजित एक संवाद के दौरान उनके ‘स्वदेशी अभियान’ पर हुए आर्थिक प्रश्नोत्तर ने राजनीतिक और आर्थिक दोनों ही हलकों में नई बहस छेड़ दी है। केंद्रीय आर्थिक आँकड़ों का हवाला देते हुए रिपोर्टर ने मंत्री से पूछा कि 2023–24 में भारत के आयात $854.80 अरब थे जबकि 2024–25 में यह $915.19 अरब—लगभग 6.85% की वृद्धि—हुई; ऐसे में ‘स्वदेशी’ का आह्वान कितना प्रभावी दिखता है
मंत्री दिनेश खटीक ने इस चुनौतीपूर्ण सवाल का जवाब सरल और राजनीतिक रूप से संवेदनशील भाषा में दिया। उन्होंने कहा कि आयात-रफ्तर को सिर्फ एक आर्थिक या सरकारी नीति के रूप में नहीं देखना चाहिए, बल्कि उसे जनसंख्या, खपत की प्रवृत्ति और वैश्विक व्यापारिक परिदृश्य के साथ जोड़ा जाना चाहिए।उनका कहना है कि जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ेगी, वैसे-वैसे इम्पोर्ट के आंकड़े बढ़ेंगे। पर इसका अर्थ यह नहीं कि हम ‘स्वदेशी’ के प्रयास न करें। हमें इसे सरकार-केवल का मुद्दा न बनाकर एक व्यापक जनजागरण बनाना होगा — उपभोक्ता की प्राथमिकता बदलकर, घरेलू आपूर्ति श्रृंखला को मज़बूत कर के और स्थानीय उद्योगों को प्रतिस्पर्धी बनाकर हम आयात-निर्भरता घटा सकते हैं।”
मंत्री ने यह स्पष्ट किया कि स्वदेशी अपनाने का समाधान केवल राजनैतिक नारों तक सीमित नहीं रहेगा—इसके लिए उपभोक्ता व्यवहार में बदलाव, उद्योगों में निवेश, छोटे-उद्योगों की क्षमता बढ़ाने और संस्थागत खरीद नीतियों में प्राथमिकता देने जैसे ठोस कदमों की आवश्यकता होगी। साथ ही उन्होंने स्थानीय कारीगरों, सूक्ष्म एवं लघु उद्योगों को प्रोत्साहन पैकेज और कर-रियायतों की भी बात की, ताकि आयातित वस्तुओं के सापेक्ष घरेलू विकल्प प्रतिस्पर्धी बन सकें।
आर्थिक विश्लेषकों ने मंत्री के बयान को मिलीजुली प्रतिक्रिया दी। एक ओर कुछ अर्थशास्त्रियों ने कहा कि ‘जनसंख्या वृद्धि’ को आयात वृद्धि की मुख्य वजह बताना बहुत साधारणीकरण होगा क्योंकि आयात में वृद्धि के पीछे विनिमय दर, घरेलू उत्पादन क्षमता, वैश्विक कच्चे माल की कीमतें और आपूर्ति-श्रंखला जैसे कई कारण होते हैं। दूसरी तरफ कुछ नीतिकारों ने माना कि जनजागरण और उपभोग पैटर्न में परिवर्तन एक महत्त्वपूर्ण पहल है, पर उसे सफल बनाने के लिए समय, ठोस नीतियाँ और निरंतर निगरानी की आवश्यकता होगी।
राजनीतिक विरोधियों ने कहा कि आंकड़े भौतिक वास्तविकताओं को दर्शाते हैं और ‘जनजागरण’ केवल नारा बन कर रह सकता है यदि अर्थव्यवस्था में उत्पादन-क्षमता और निवेश की कमी बनी रहती है।
समर्थकों ने इसे व्यावहारिक और दीर्घकालिक रणनीति कहा, जो सांकेतिक राजनीति से ऊपर उठकर व्यवहारिक उपाय सुझाती है।
मंत्री का बयान यह संकेत देता है कि प्रदेश सरकार ‘स्वदेशी’ को सिर्फ लोकलुभावन अभियान के रूप में नहीं, बल्कि एक दीर्घकालिक सामाजिक आर्थिक परिवर्तन के तौर पर देखने की कोशिश कर रही है। असल काम अब नीति निर्माण और उसे जमीन पर लागू करने के तंत्र में है वहीं वह चुनौती बनी रहेगी कि जनता एवं बाजार दोनों को किस तरह से स्वदेशी विकल्पों के साथ जोड़ा जाए ताकि वास्तविक आयात-निर्भरता में कमी आए।





