
सूर्या अग्निहोत्री
जब वक्त इंसान के विपरीत चलता है, तब उसकी काबिलियत नहीं बदलती — बदलती है लोगों की नज़र। वही व्यक्ति, जो कभी अभिनय की मिसाल माना जाता था, अचानक “कम महत्वपूर्ण” समझ लिया जाता है। ठीक ऐसा ही कुछ आज अक्षय खन्ना के साथ होते हुए दिखाई देता है।
फ़िल्म “धुरंधर ” में रहमान डकैत जैसे जटिल और दमदार किरदार को निभाने वाले अक्षय खन्ना को कथित तौर पर करीब 2.5 करोड़ रुपये दिए गए। वहीं उसी फिल्म में लीड रोल के लिए रणवीर सिंह को लगभग 50 करोड़ और संजय दत्त को करीब 10 करोड़ रुपये मिलने की चर्चा है।
आंकड़े चौंकाते हैं, लेकिन इससे ज्यादा चौंकाने वाली है यह सोच — कि अभिनय की कीमत स्टारडम से तय की जाती है।
अक्षय खन्ना उन कलाकारों में से हैं जो शोर नहीं करते, प्रचार नहीं मांगते, बस कैमरे के सामने खड़े होकर किरदार को जीते हैं। उनकी आंखों की खामोशी, संवादों की गहराई और चेहरे की सादगी में ऐसा असर होता है, जो कई बार भारी-भरकम संवादों और भव्य दृश्यों पर भारी पड़ जाता है।
धुरंधर में रहमान डकैत का किरदार सिर्फ एक रोल नहीं है, वह फिल्म की आत्मा है। ऐसा किरदार जो बिना चिल्लाए, बिना नाटकीयता के दर्शकों के भीतर उतर जाता है। अगर ईमानदारी से देखा जाए, तो इस फिल्म में पूरी जान अक्षय खन्ना ने डाली है।
फिर सवाल उठता है क्या मेहनत का मोल सिर्फ पोस्टर साइज और बॉक्स ऑफिस के नाम पर तय होना चाहिए? क्या एक सच्चा कलाकार इसलिए कमतर हो जाता है क्योंकि वह लाइमलाइट से दूर रहता है?
अक्षय खन्ना ने कभी भी खुद को बाजार के हिसाब से ढालने की कोशिश नहीं की। उन्होंने भीड़ का हिस्सा बनने की बजाय अभिनय की शुद्धता को चुना। शायद यही उनकी सबसे बड़ी ताकत है, और दुर्भाग्य से यही उनकी “कमजोरी” भी मान ली गई।
यह भेदभाव सिर्फ पैसों का नहीं है, यह सोच का है। यह उस सिस्टम का आईना है, जहां स्टार को कलाकार से बड़ा मान लिया गया है। लेकिन सिनेमा का इतिहास गवाह है फिल्में चेहरे से नहीं, अभिनय से याद रखी जाती हैं।
आज जरूरत इस बात की है कि हम कलाकारों को उनके योगदान से आंकें, न कि उनके बाजार मूल्य से। क्योंकि जब भी Dhurandhar याद की जाएगी, तो रहमान डकैत का किरदार भी याद किया जाएगा — और उस किरदार के साथ अक्षय खन्ना का नाम हमेशा जीवित रहेगा।
क्योंकि समय चाहे जैसा हो, सच्ची प्रतिभा कभी रद्दी नहीं होती।
(लेखक यूथ इंडिया न्यूज ग्रुप के डिप्टी एडिटर हैं।)






