यूथ इंडिया
फर्रुखाबाद में राष्ट्रीय कृमि मुक्ति अभियान (National Deworming Campaign) शुरू होने से पहले ही जिस तरह सैकड़ों बच्चे बीमार पड़े, उसने सरकारी योजनाओं की ज़मीनी सच्चाई को उजागर कर दिया है। कमालगंज क्षेत्र के राठौरा मोहद्दीनपुर में दवा खिलाने के बाद बच्चों की तबीयत बिगड़ना कोई सामान्य घटना नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही का गंभीर संकेत है।
यह अभियान बच्चों को स्वस्थ रखने के उद्देश्य से चलाया जा रहा है, लेकिन जब वही दवा बच्चों को अस्पताल पहुंचा दे, तो सवाल सिर्फ एक स्कूल या एक गांव का नहीं रह जाता—यह पूरे स्वास्थ्य तंत्र पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
तैयारियों के दावे, ज़मीनी हकीकत
स्वास्थ्य विभाग हर साल बड़े-बड़े दावों के साथ कृमि मुक्ति अभियान की शुरुआत करता है। प्रशिक्षण, मॉक ड्रिल, समन्वय और निगरानी की लंबी सूची कागज़ों पर तैयार रहती है। लेकिन राठौरा मोहद्दीनपुर की घटना बताती है कि दावे और धरातल के बीच गहरी खाई अब भी मौजूद है। जवाहरलाल प्रेमा देवी जूनियर हाई स्कूल में दवा दिए जाने के कुछ ही समय बाद बच्चों में उल्टी, चक्कर, पेट दर्द और बेहोशी जैसे लक्षण सामने आना इस बात की ओर इशारा करता है कि कहीं न कहीं गंभीर चूक हुई है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि गलती कहाँ हुई,
क्या दवा की गुणवत्ता पर पहले से कोई जांच हुई थी?
क्या बच्चों को उम्र और वजन के अनुसार सही खुराक दी गई?
क्या बच्चों को खाली पेट दवा खिला दी गई, जबकि स्पष्ट दिशा-निर्देश इसके विपरीत हैं?
इन सवालों का जवाब अभी धुंध में है, लेकिन इतना स्पष्ट है कि जो भी चूक हुई, उसकी कीमत बच्चों ने चुकाई।
हड़कंप और फायरफाइटिंग सिस्टम
घटना के बाद मुख्य चिकित्सा अधिकारी का मौके पर पहुंचना और बच्चों को अस्पताल रेफर करना आवश्यक कदम था, लेकिन यह रोकथाम नहीं, नुकसान के बाद की कार्रवाई है। कुछ बच्चों को लोहिया अस्पताल और कुछ को अन्य स्वास्थ्य केंद्रों में भेजा जाना इस बात का प्रमाण है कि स्थिति नियंत्रण से बाहर हो चुकी थी।
आंकड़ों के पीछे छिपा खतरा
जब एक ही दिन में जिले में 9 लाख से अधिक बच्चों को दवा देने का लक्ष्य रखा जाता है, तो यह सिर्फ एक स्वास्थ्य कार्यक्रम नहीं, बल्कि जोखिम प्रबंधन की बड़ी परीक्षा बन जाता है। इतनी बड़ी संख्या में बच्चों को दवा देने से पहले यदि हर स्तर पर निगरानी नहीं हो, तो ऐसी घटनाएं दोहराना तय है।
भय, आक्रोश और अविश्वास
घटना के बाद परिजनों में डर और गुस्सा स्वाभाविक है। बच्चों की जान से बड़ा कोई लक्ष्य नहीं हो सकता। यदि समय पर इलाज न मिलता, तो यह घटना कहीं बड़े हादसे में बदल सकती थी।
अब अभिभावक केवल आश्वासन नहीं, बल्कि जवाबदेही और कार्रवाई चाहते हैं। कृमि मुक्ति अभियान की मंशा पर सवाल नहीं, लेकिन उसके क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल जरूर खड़े हो गए हैं। जब तक दोषियों की पहचान कर स्पष्ट कार्रवाई नहीं होती, दवा की गुणवत्ता और प्रक्रिया की पारदर्शी जांच नहीं होती, तब तक ऐसे अभियान भरोसा नहीं जगा सकते।
यह घटना चेतावनी है
योजनाएं आंकड़ों से नहीं, ज़िम्मेदारी से सफल होती हैं।


