लखनऊ| कफ सिरप की अवैध तस्करी को लेकर चल रही जांच का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है। जांच एजेंसियां अब केवल तस्करी के मामलों तक सीमित न रहकर इसके पीछे काम कर रहे अंतरराज्यीय और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क की परतें खोलने में जुटी हैं। फर्जी बिलिंग के जरिए कफ सिरप की खेप को वैध दिखाकर तस्करी के रूट, एजेंटों और पूरे सप्लाई चेन को चिन्हित किया जा रहा है। खास बात यह है कि पूर्वोत्तर भारत के कई राज्यों में बीते दो से तीन दशकों से कफ सिरप के भंडारण और ट्रांजिट के ठिकाने सक्रिय पाए गए हैं, जिनका इस्तेमाल लंबे समय से तस्करी के लिए किया जा रहा है।

जांच में सामने आया है कि कोरोना काल को छोड़ दिया जाए तो हर साल कफ सिरप की तस्करी में लगातार इजाफा हुआ है। इस पूरे अवैध कारोबार की जांच कर रहे प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को शक है कि उत्तर प्रदेश समेत पांच राज्यों में सक्रिय सिंडिकेट से होने वाली काली कमाई का इस्तेमाल टेरर फंडिंग के लिए किया जा रहा है। इसी आशंका के चलते जांच एजेंसियां अब सिंडिकेट के बड़े चेहरों के साथ-साथ बांग्लादेश सीमा पर सक्रिय एजेंटों, कूरियर नेटवर्क और भंडारण अड्डों की भी गहराई से पड़ताल कर रही हैं। इस संबंध में केंद्रीय और राज्य स्तरीय खुफिया एजेंसियों से लगातार सूचनाएं जुटाई जा रही हैं।

एजेंसियों की नजर खास तौर पर उन फार्मा कंपनियों पर है, जो कोडीनयुक्त कफ सिरप का निर्माण तय सरकारी अनुमति से कहीं अधिक मात्रा में कर रही हैं। जांच में यह भी सामने आया है कि निर्माण के बाद ये कंपनियां अलग-अलग सिंडिकेट के जरिए सिरप को बांग्लादेश तक पहुंचाती हैं। भारत में करीब 200 रुपये कीमत वाला कफ सिरप बांग्लादेश में एक हजार रुपये तक में बेचा जाता है, जबकि खाड़ी देशों में इसकी कीमत ढाई हजार रुपये तक पहुंच जाती है। यही वजह है कि तस्करी का यह धंधा लगातार फल-फूल रहा है और इसमें नए लोग और गिरोह जुड़ते जा रहे हैं।

बार्डर सिक्योरिटी फोर्स (बीएसएफ) की जांच में पहले ही यह खुलासा हो चुका है कि यूपी, बिहार और पश्चिम बंगाल के रास्ते कफ सिरप की बड़ी खेप पश्चिम बंगाल के 24 परगना, नदिया, सिलीगुड़ी, कूचबिहार, अलीपुरद्वार और दीनाजपुर जैसे जिलों में पहुंचाई जाती है। इसके अलावा असम, मणिपुर, त्रिपुरा और मेघालय में भी सिरप को भंडारित किया जाता है। बाद में आलू, प्याज और चाय की पत्ती जैसी रोजमर्रा की वस्तुओं के साथ छिपाकर इन्हें बांग्लादेश भेज दिया जाता है, ताकि सीमा पर जांच एजेंसियों की नजर से बचा जा सके।

जांच के दौरान कफ सिरप तस्करी के नेटवर्क का सीधा संबंध हिमाचल प्रदेश के सोलन से भी सामने आया है। सूत्रों के मुताबिक, सोलन की कई फार्मा कंपनियों से कफ सिरप की बड़ी खेप पश्चिम बंगाल के रास्ते झारखंड की राजधानी रांची पहुंचती थी। यहां से इसे अलग-अलग इलाकों में वितरित किया जाता था। भारत और बांग्लादेश के बीच मेघना नदी के रास्ते बड़े पैमाने पर फेंसिडिल और अन्य कफ सिरप की तस्करी की जाती रही है। एजेंसियों का अनुमान है कि इस एक रूट से ही करीब 10 हजार करोड़ रुपये के अवैध कारोबार को अंजाम दिया गया।

एसटीएफ और ड्रग विभाग की जांच में यह भी खुलासा हुआ है कि हिमाचल प्रदेश से कफ सिरप मंगाने पर तस्करों को करीब दस गुना तक मुनाफा होता था। यही भारी मुनाफा इस नेटवर्क को लगातार मजबूत करता गया और आज यह तस्करी केवल अवैध कमाई तक सीमित न रहकर देश की सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मुद्दा बन चुकी है। जांच एजेंसियां अब इस पूरे नेटवर्क को जड़ से खत्म करने के लिए बड़े स्तर पर कार्रवाई की तैयारी में जुटी हैं।

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