ईमानदार अफसर पर दबाव की दर्दनाक दास्तान, चर्चा में
फर्रुखाबाद। सिटी मजिस्ट्रेट रहे संजय कुमार बंसल के असामयिक निधन ने जहां पूरे प्रशासनिक महकमे को शोक में डुबो दिया है, वहीं अब सामने आ रहे आरोप इस संवेदनशील प्रकरण को और भी गंभीर बना रहे हैं। एक ओर लोग उन्हें एक शांत, सौम्य और ईमानदार अधिकारी के रूप में याद कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर अब उनके जीवन के अंतिम दिनों से जुड़ी जो बातें सामने आ रही हैं, वे भीतर तक झकझोर देने वाली हैं।
कलेक्ट्रेट परिसर से जुड़े सूत्रों के हवाले से जो आरोप सामने आए हैं, उनके अनुसार एक साल पूर्व जिले से सेवानिवृत्त हुए अवर अभियंता डीके सिंह द्वारा कथित तौर पर उन्हें ब्लैकमेल किया जा रहा था। दावा किया जा रहा है कि किसी कथित लेन-देन से जुड़ा एक वीडियो क्लिप बनाकर उसे दबाव का माध्यम बनाया गया और लंबे समय तक मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि अब तक नहीं हुई है, लेकिन जिस तरह से यह चर्चा प्रशासनिक गलियारों में फैल रही है, उसने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
बताया जाता है कि संजय कुमार बंसल अपने कार्यकाल में नियमों और कानून के दायरे में रहकर काम करने के लिए जाने जाते थे। लेकिन सूत्रों का कहना है कि कथित दबाव के चलते उनसे ऐसे कई निर्णय करवाने की कोशिश की गई, जिनसे वह स्वयं सहमत नहीं थे। शहर के गेस्ट हाउस, शिक्षण संस्थान और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को नोटिस जारी कराना और बाद में उन्हीं मामलों में स्थगन आदेश आ जाना—इन घटनाओं को लेकर भी अंदरखाने कई तरह की चर्चाएं होती रहीं।
आरोप यह भी हैं कि जब उन्होंने ऐसे कार्यों से इंकार किया, तो उनके खिलाफ झूठी शिकायतों और जांच की धमकी देकर दबाव बढ़ाया गया। शासन स्तर पर सेटिंग के नाम पर उच्च स्तरीय जांच समिति का भय दिखाया जाना, बार-बार शिकायतें कराना और प्रतिष्ठा पर आघात पहुंचाने की कोशिशें—इन सबने एक संवेदनशील और कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी को भीतर से तोड़ दिया था ।
करीबी लोगों के अनुसार, यह मानसिक दबाव धीरे-धीरे उनके व्यक्तित्व पर भारी पड़ने लगा था। देर रात तक चिंता में डूबे रहना, लगातार तनाव में काम करना और हालात से जूझते रहना—यह सब उनके जीवन का हिस्सा बनता जा रहा था। यहां तक कि यह भी चर्चा है कि अत्यधिक मानसिक दबाव के कारण उन्होंने शराब का सेवन बढ़ा दिया था, जिसने उनके स्वास्थ्य पर गंभीर असर डाला।चर्चा तो यहाँ तक है कि माफिया तंत्र के षड्यंत्र के तहत उन्हें स्लो प्वाइजन देकर जबरिया मौत के घाट उतारा गया है।
आज जब संजय कुमार बंसल हमारे बीच नहीं हैं, तो यह सवाल और भी गूंज रहा है कि क्या एक ईमानदार अधिकारी को सिस्टम के भीतर ही ऐसे हालात में धकेल दिया गया, जहां वह अकेला पड़ गया? क्या सच में कोई ऐसा दबाव था, जिसने उन्हें अंदर ही अंदर तोड़ दिया?
जनपद के लोगों और सामाजिक संगठनों ने इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष और उच्च स्तरीय जांच की मांग की है। विशेष रूप से आरोपित व्यक्ति के मोबाइल फोन, कॉल डिटेल्स और वित्तीय लेन-देन की गहन जांच की मांग उठ रही है, ताकि सच्चाई सामने आ सके।
फिलहाल प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है, लेकिन जिस तरह से यह मामला उभर रहा है, उसने पूरे सिस्टम को कठघरे में खड़ा कर दिया है।
यह सिर्फ एक अधिकारी की मौत नहीं, बल्कि एक ऐसे इंसान की खामोश चीख है, जो शायद अपने कर्तव्य और दबाव के बीच पिसता चला गया। अब देखना यह है कि क्या सच सामने आएगा या यह कहानी भी फाइलों में दबकर रह जाएगी।


