लखनऊ
प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं और इसी के साथ जातीय समीकरण साधने की कोशिशें भी खुलकर सामने आने लगी हैं। पश्चिमी यूपी में कश्यप-निषाद समाज को अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा देने की मांग ने सियासी माहौल को गर्म कर दिया है। अलग-अलग मंचों से उठी इस मांग ने सत्ता और सहयोगी दलों के बीच नई रणनीतिक हलचल पैदा कर दी है।
दरअसल, नरेंद्र कश्यप द्वारा गाजियाबाद के रामलीला मैदान में आयोजित महर्षि कश्यप जयंती महाकुंभ में बड़ी संख्या में लोगों की भागीदारी देखी गई। इस कार्यक्रम में प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। यहां मंच से कश्यप-निषाद समाज की सात समतुल्य जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने की मांग जोर-शोर से उठाई गई।
वहीं, कुछ ही दूरी पर नोएडा के इनडोर स्टेडियम में डॉ. संजय निषाद के नेतृत्व में निषाद पार्टी ने गुर्जर-निषाद सम्मेलन का आयोजन कर अपनी राजनीतिक ताकत का प्रदर्शन किया। इस कार्यक्रम के जरिए निषाद पार्टी ने न केवल अपनी सामाजिक पकड़ मजबूत करने का संदेश दिया, बल्कि सहयोगी भाजपा पर भी दबाव बनाने की रणनीति अपनाई।
दोनों आयोजनों में समान रूप से कश्यप-निषाद समाज से जुड़ी सात जातियों को SC का दर्जा देने की मांग उठना इस बात का संकेत है कि पश्चिमी यूपी में जातीय राजनीति एक नए दौर में प्रवेश कर चुकी है। यह मुद्दा आने वाले चुनावों में निर्णायक भूमिका निभा सकता है, क्योंकि इस समाज की आबादी कई सीटों पर प्रभावी मानी जाती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मांग केवल सामाजिक न्याय तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे चुनावी गणित भी छिपा है। विभिन्न दल अपने-अपने तरीके से इस वर्ग को साधने में जुटे हैं, जिससे आने वाले समय में गठबंधन और समीकरणों में बदलाव देखने को मिल सकता है।
कुल मिलाकर, कश्यप-निषाद समाज को SC का दर्जा देने की मांग ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। अब देखना होगा कि सरकार इस मांग पर क्या रुख अपनाती है और इसका आगामी चुनावों पर क्या प्रभाव पड़ता है।


