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Saturday, April 4, 2026

जीवाई-वेंचर्स का कथित ‘कैश-चेक खेल’: सेक्टर 140 के आईटी स्पेस से सेक्टर- 50 तक करोड़ों के राजस्व पर डांका 

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हाई रिटर्न्स, का भी खेल 

– दुबई से फंडिंग की भी आशंका?

– सुन्दर बिल्डिंग दिखा कर फसाते ग्राहक 

– पूर्व में पड़ चुकी आयकर की रेड 

– कार्रवाही के दौरान सेटिंग की भी चर्चा

नोएडा। नॉएडा के सेक्टर – 140 में विकसित किए जा रहे कमर्शियल आईटी ऑफिस स्पेस को लेकर जीवाई-वेंचर्स (जीवाई वेंचर्स ) पर गंभीर आरोपों की बौछार हो रही है। आधी-अधूरी बिल्डिंग, निवेशकों की फंसी पूंजी और कथित तौर पर कैश-चेक के खेल के जरिए करोड़ों के राजस्व नुकसान का मामला अब सुर्खियों में है। शिकायतकर्ताओं का दावा है कि बिल्डर ने हाई-एंड कमर्शियल स्पेस के नाम पर बड़े निवेश आकर्षित किए, लेकिन निर्माण अधूरा छोड़कर आर्थिक अनियमितताओं में उलझ गया।

सूत्रों और निवेशकों के आरोपों के अनुसार, इस प्रोजेक्ट में एक-एक यूनिट की कीमत करीब 3.5 करोड़ से 4.5 करोड़ रुपये तक बताई गई। आरोप है कि प्रति डील लगभग 1.5 से 2 करोड़ रुपये तक कैश (ऑन-मनी) लिया जाता है, जबकि शेष राशि को आधिकारिक दस्तावेजों में दर्शाया जाता है। इससे न सिर्फ गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स बल्कि स्टैंप ड्यूटी और आयकर में भी बड़े पैमाने पर कथित गड़बड़ी की आशंका जताई जा रही है।

निवेशकों का कहना है कि कई मामलों में “बायर एग्रीमेंट” या आंतरिक अनुबंधों के जरिए असल रकम और आधिकारिक रकम में बड़ा अंतर रखा गया, जिससे टैक्स देनदारी कम दिखाई जा सके। यदि इन एग्रीमेंट्स की गहन जांच हो, तो भारी मात्रा में कैश ट्रांजैक्शन सामने आने का दावा किया जा रहा है। आरोप यह भी है कि प्रोजेक्ट की ग्राउंड रियलिटी—अधूरा निर्माण, सीमित सुविधाएं—के बावजूद बिक्री टीम द्वारा ऊंचे रिटर्न और प्रीमियम लोकेशन के सपने दिखाकर लोगों को निवेश के लिए प्रेरित किया गया।

इसी क्रम में सेल्स टीम के एक प्रमुख चेहरे राहुल मिश्रा का नाम भी निवेशकों की शिकायतों में सामने आ रहा है, जिन पर “हाई रिटर्न” और “तेजी से कब्जा” जैसे वादों के जरिए ग्राहकों को जोड़ने के आरोप हैं। वहीं बिल्डर अभिषेक गोयल पर यह आरोप है कि कई शिकायतों के बावजूद उन्होंने सार्वजनिक तौर पर स्पष्ट जवाब नहीं दिया।

मामले ने तब और तूल पकड़ा जब सेक्टर 50 में प्रस्तावित ‘फाइव-ओ’ (5-0) प्रोजेक्ट को लेकर भी इसी तरह के पैटर्न के आरोप सामने आए। यहां कथित तौर पर ग्रीन बेल्ट आवंटन के बाद कमर्शियल प्रोजेक्ट लाने और प्रॉफिट एडजस्टमेंट के लिए कैश-चेक मॉडल अपनाने की बातें कही जा रही हैं। निवेशकों का दावा है कि दोनों लोकेशनों पर एक जैसा “आधा कैश-आधा चेक” का ट्रेंड देखने को मिला, जिससे टैक्स देनदारी कम दिखाने का रास्ता बनाया गया।

इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल जांच एजेंसियों की भूमिका को लेकर उठ रहा है। आरोप हैं कि आयकर और जीएसटी से जुड़े मामलों में अब तक कोई ठोस कार्रवाई सामने नहीं आई, जिससे “सेटिंग” की चर्चा भी तेज है। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि जांच के बाद ही संभव है, लेकिन लगातार बढ़ती शिकायतों ने रियल एस्टेट सेक्टर में पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

फिलहाल निवेशक न्याय और अपने फंसे पैसे की वापसी की मांग कर रहे हैं। यदि निष्पक्ष जांच होती है, तो यह स्पष्ट हो सकेगा कि यह मामला केवल अधूरे प्रोजेक्ट का है या फिर इसके पीछे करोड़ों के राजस्व से जुड़ा बड़ा खेल छिपा है।

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