खुलेआम अराजकता : त्रिपोलिया चौक पर सरे बाजार फूंका गया सदर विधायक का पुतला

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 सदर विधायक चोर है के लगे नारे, खुलेआम बताये गये नशेड़ी
फूंके गये पुतले पर टांगी गई बियर की बोतलें

यूथ इंडिया संवाददाता
फर्रुखाबाद। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कथित पदाधिकारियों और स्वयंभू अध्यक्ष संजय राणा के नेतृत्व में रविवार को सदर कोतवाली क्षेत्र के त्रिपोलिया चौक पर सरे बाजार सदर विधायक मेजर सुनील दत्त द्विवेदी का माफिया तंत्र ने न केवल पुतला फुंकवा दिया, बल्कि सदर विधायक चोर है, सदर विधायक नशेड़ी है के नारे लगवाकर पूरी कानून व्यवस्था को खुली चुनौती दे दी गई। शहर कोतवाल राजीव पाण्डेय और उनकी पुलिस पूरे इस शर्मनाक हाईटेक ड्रामें को देखती रही। यह कई दशक में पहला मौका है जब ऐतिहासिक त्रिपोलिया चौक पर जहां कभी आजादी की जंग में शंखनाद होते थे। वहां एक ईमानदार और साफ सुथरी छवि के जनप्रिय नेता का खुलेआम अपमान किया गया हो।
बीते कई दिनों से जिला प्रशासन कचहरी के एक कुख्यात वकील और उसके गैंग के शिकंजा कसे है इस गैंग द्वारा मानस मंदिर ट्रस्ट समेत कई ट्रस्टों व सरकारी जमीनों पर कब्जे भी आम बात हो गये थे। जिले के कई वर्गो के लोगों को आवाज उठाने के बदले फर्जी मुकदमों में फांसकर उनका उत्पीडन कराया जा रहा था। सरकार की जीरो टालरेंस नीति पर ठप्पा लगने के कारण जिले की पुलिस कप्तान आरती सिंह ने कड़ा एक्शन लेते हुए कुछ माफिया पर हाथ डाल दिया था। सजातीय होने के कारण उन गुण्डों ने अपनी पैरवी सदर विधायक मेजर सुनील दत्त द्विवेदी से कराने की गुहार लगाई थी। मेजर के साफ इंकार करने के बाद यह माफिया मंत्र अंदरखाने उनके पीछे पड गया था। विधायक को बदनाम करने की पहले से ही मंशा में रहे उनके राजनैतिक प्रतिद्वंदी इस मौके को भुलाने में पीछे नही रहे और उन्होने अखिल विद्यार्थी परिषद जैसी साफ सुथरी संस्था का चोला ओड़ रविवार को सरकार पर ही सीधा अटैक करते हुए सदर विधायक का सदर विधायक का सरे बाजार पुतलाप फूंक दिया। बनाई गई बीडीओ को सोशल मीडिया के जरिए वायरल किया जा रहा है। जिससे कि विधायक की आढ़ में योगी सरकार की छवि धूािमल की जा सके।

अपराध से अनाथ हो चुके विधायक सदैव से अपराधियों के विरोधी
फर्रुखाबाद। भारतीय जनता पार्टी के संस्थापक सदस्यों में रहे अपने पिता की हत्या के बाद अपराध से अनाथ हो चुके सैन्य अधिकारी से नेता बने मेजर सुनील दत्त द्विवेदी सदैव ही अपराध और अपराधियों के विरोधी रहे। १० फरवरी १९९७ को उनके यशस्वी राजनेता पिता पूर्व ऊर्जा मंत्री ब्रहम्दत्त द्विवेदी की चौक के निकट ही गोली मारकर निर्मम हत्या कर दी गई थी। वह मुख्यमंत्री पद के दावेदार कहे जाते थे। मेजर द्विवेदी ने अपने कैरियर को दांव पर लगाने के बाद कानूनी रूप से पिता की हत्या का बदला लेने का वीडा उठाया था। दो दशक तक उन्होने कलम से संघर्ष करने के बाद विजयश्री हांसिल करते हुए मुख्य हत्यारोपी विजय सिंह को जेल की सलाखों के पीछे पहुंचवाया। दूसरी वार विधायक चुने जाने के बाद उन्होने कभी भी न ही अपराध को बढावा दिया और न ही अपराधियों को संरक्षण। जिस कारण अपराध जगत के कुछ चुनिंदा कुख्यात अपराधी उनके विरोधी हो गये। अपनी विधान सभा में उन्होने अपराधिक तत्वों को पास भी भटकने नही दिया। जिला प्रशासन ने राज्य सरकार की जीरो टालरेंस के मुताबिक जब भी काम किया तो कभी मेजर द्विवेदी के सजातीय भी निशाने पर आये। लेकिन उन्होने साफ कहा कि अपराध और अपराधी की कोई जाति नही होती, हम कानून के रखवाले हैं, कोई अपराधियों के पनाहगार नही।

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