पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव की गूंज अब सीधे भारतीय परिवारों तक पहुंच रही है। इस्फाहान में अध्ययनरत भारतीय छात्रों की अपील केवल एक प्रशासनिक मांग नहीं, बल्कि असुरक्षा और अनिश्चितता के बीच फंसे युवाओं की पुकार है। विशेष रूप से Isfahan University of Medical Sciences में पढ़ रहे छात्र जिस भयावह माहौल का उल्लेख कर रहे हैं, वह स्थिति की गंभीरता को स्पष्ट करता है।
करीब 25 से 30 भारतीय छात्र वहां मौजूद बताए जा रहे हैं। छात्रा फातिमा द्वारा जारी वीडियो संदेश ने देशभर के अभिभावकों की चिंता बढ़ा दी है। विस्फोट जैसी आवाजें सुनाई देना, इंटरनेट सेवाओं का बाधित होना, बाजारों का बंद होना और छात्रावास से बाहर न निकलने की सलाह—ये सब संकेत हैं कि हालात सामान्य नहीं हैं। ऐसे समय में सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या छात्रों की सुरक्षा सुनिश्चित है?
विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा प्रथम और द्वितीय वर्ष के छात्रों के लिए अगला सेमेस्टर ऑनलाइन करने की बात राहत देती है, लेकिन अंतिम वर्ष के छात्रों को अस्पताल में अनिवार्य ड्यूटी पर बनाए रखना संवेदनशील स्थिति में जोखिमपूर्ण निर्णय प्रतीत होता है। शिक्षा महत्वपूर्ण है, लेकिन जीवन उससे कहीं अधिक मूल्यवान है। यदि क्षेत्रीय हालात अस्थिर हैं, तो वैकल्पिक व्यवस्था पर तत्काल विचार होना चाहिए।
यह स्थिति केवल इस्फहान तक सीमित नहीं है। पश्चिम एशिया में समय-समय पर उभरते तनाव ने पहले भी भारतीय नागरिकों को प्रभावित किया है। भारत सरकार ने अतीत में संकटग्रस्त देशों से अपने नागरिकों की सुरक्षित वापसी के लिए उल्लेखनीय अभियान चलाए हैं। ऐसे में उम्मीद की जाती है कि वर्तमान परिस्थिति में भी विदेश मंत्रालय सक्रियता दिखाएगा और स्थानीय दूतावास के माध्यम से छात्रों की सुरक्षा का ठोस आकलन करेगा।
छात्रों की दुविधा भी समझी जानी चाहिए। वर्षों की मेहनत, मेडिकल शिक्षा का दबाव, अस्पताल प्रशिक्षण की अनिवार्यता—इन सबके बीच अचानक देश छोड़ना आसान निर्णय नहीं होता। लेकिन जब जान पर बन आए, तो प्राथमिकता स्पष्ट होनी चाहिए। विश्वविद्यालय और स्थानीय प्रशासन को भी मानवीय दृष्टिकोण अपनाना चाहिए और शैक्षणिक नुकसान की भरपाई के विकल्प तलाशने चाहिए।
परिसर के बाहर किराये के मकानों में रह रहे छात्रों की स्थिति और भी चिंताजनक है। सीमित संसाधनों, बंद बाजारों और बाधित ऑनलाइन सेवाओं के बीच जीवनयापन कठिन होता जा रहा है। यदि इंटरनेट बाधित है, तो परिवारों से संपर्क टूटना मानसिक तनाव को और बढ़ा देता है। यह केवल भौतिक सुरक्षा का मुद्दा नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य का भी प्रश्न है।
भारत सरकार के लिए यह समय संवेदनशील कूटनीतिक संतुलन का है। एक ओर अंतरराष्ट्रीय संबंधों की जटिलता है, तो दूसरी ओर अपने नागरिकों की सुरक्षा का दायित्व। छात्रों ने सुरक्षित निकासी या कम से कम सुरक्षित स्थानों पर स्थानांतरण की मांग की है। यह मांग अनुचित नहीं कही जा सकती।
संकट के समय सरकार की सक्रियता ही नागरिकों का विश्वास मजबूत करती है। आवश्यक है कि भारतीय दूतावास छात्रों से नियमित संपर्क बनाए रखे, हेल्पलाइन को प्रभावी बनाए और यदि हालात बिगड़ते हैं तो चरणबद्ध निकासी योजना तैयार रखे।
युवाओं का भविष्य राष्ट्र की पूंजी है। वे पढ़ने गए हैं, युद्ध का सामना करने नहीं। इसलिए इस्फहान में फंसे भारतीय छात्रों की आवाज को केवल एक खबर न समझा जाए, बल्कि उसे राष्ट्रीय दायित्व के रूप में देखा जाए। सुरक्षा पहले, पढ़ाई बाद में—यही इस समय की सबसे बड़ी जरूरत है।






