शरद कटियार
भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक रिश्तों में खटास अब खुलकर सामने आ चुकी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर अतिरिक्त 25 प्रतिशत टैरिफ लगाने का ऐलान किया था जिसकी समयसीमा 27 अगस्त को पूरी हो गई। इसके बाद भारत पर अब कुल 50 प्रतिशत तक का टैरिफ लागू हो गया है। यह स्थिति सीधे तौर पर भारतीय अर्थव्यवस्था और खासकर निर्यात आधारित उद्योगों के लिए बड़ा झटका है।
फार्मा, ऑटो पार्ट्स, टेक्सटाइल, स्टील और कृषि उत्पाद जैसे सेक्टर अमेरिकी बाजार पर बहुत अधिक निर्भर हैं। जब भारतीय सामान की कीमत वहां लगभग दोगुनी हो जाएगी तो अमेरिकी कंपनियां चीन, वियतनाम और मैक्सिको जैसे विकल्पों की ओर मुड़ सकती हैं। इससे भारत के लाखों श्रमिकों और उद्योगपतियों को नुकसान झेलना पड़ेगा।सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या मोदी सरकार ने इस संकट से निपटने के लिए कोई ठोस तैयारी की है। मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत जैसे नारों के बावजूद वास्तविकता यह है कि भारतीय उद्योग अब भी अमेरिकी बाजार पर गहरी निर्भरता रखते हैं। आईटी सेवाओं से लेकर कपड़ा उद्योग तक, हर क्षेत्र पर असर पड़ेगा।इस व्यापार युद्ध ने कूटनीतिक स्तर पर भी भारत की कमजोरी उजागर कर दी है। तमाम दावों के बावजूद अमेरिका ने अपने हितों को प्राथमिकता दी और भारत के हितों की अनदेखी की। यह याद रखना होगा कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति केवल आर्थिक और सामरिक हितों पर टिकी होती है, न कि दिखावटी दोस्ती पर।भारत के सामने अब चुनौती है कि वह अमेरिका के सामने झुककर रियायतें दे या फिर वैकल्पिक बाजारों की तलाश करे। यूरोप, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और आसियान देशों में नए अवसर तलाशने होंगे। साथ ही घरेलू उद्योग को राहत पैकेज और टैक्स रियायत देकर सशक्त बनाना होगा।
यह केवल टैरिफ का मुद्दा नहीं है, बल्कि भारत की आर्थिक संप्रभुता और कूटनीतिक क्षमता की असली परीक्षा है। सरकार को अब ठोस कदम उठाने होंगे, वरना 50 प्रतिशत टैरिफ का यह झटका लाखों नौकरियों और करोड़ों लोगों के भविष्य को डगमगा देगा।




