भाई दूज — प्रेम, सुरक्षा और सांस्कृतिक एकता का सनातन प्रतीक

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शरद कटियार
भाई-बहन के स्नेह से जुड़ा पर्व, जिसके पीछे छिपा है समाज की आध्यात्मिक और सामरिक चेतना का गहरा संदेश
भारतीय संस्कृति में पर्व केवल धार्मिक आयोजन नहीं होते, वे संवेदनाओं, संस्कारों और सामाजिक जिम्मेदारियों के प्रतीक भी हैं। दीपावली के पश्चात मनाया जाने वाला भाई दूज ऐसा ही एक पावन पर्व है, जो भाई-बहन के अटूट स्नेह, कर्तव्य और सुरक्षा के बंधन को नई ऊंचाई देता है।
लेकिन इस पर्व का महत्व केवल पारिवारिक या भावनात्मक नहीं है — इसके पीछे इतिहास, धर्मशास्त्र और सामरिक चेतना का गहरा ताना-बाना जुड़ा है।
भाई दूज का उल्लेख स्कंद पुराण, भाविष्य पुराण और पद्म पुराण तक में मिलता है।
कथानुसार, जब भगवान यमराज अपनी बहन यमुना के घर पहुँचे, तो यमुना ने स्नेहपूर्वक उनका स्वागत किया, आरती उतारी और तिलक लगाया।
यमराज प्रसन्न होकर बोले — “जो भी इस दिन अपनी बहन से तिलक कराएगा, उसे अकाल मृत्यु का भय नहीं रहेगा।”
तभी से यह पर्व ‘यम द्वितीया’ के रूप में प्रसिद्ध हुआ।
यह कथा केवल एक पौराणिक प्रसंग नहीं, बल्कि संरक्षण और करुणा की भावना का प्रतीक है।
यह संदेश देती है कि परिवार और समाज में रक्षा केवल पुरुष का कर्तव्य नहीं, बल्कि नारी की भी आध्यात्मिक शक्ति का विस्तार है।
यदि हम इसके सामरिक महत्व की बात करें, तो भाई दूज एक ऐसे समय में मनाया जाता है जब फसलें पक रही होती हैं, सीमाएं शांत होती हैं और समाज उत्सव के चरम पर होता है।
यह पर्व उस मानसिकता को मजबूत करता है जिसमें पुरुष रक्षा का संकल्प लेते हैं और महिलाएं आशीर्वाद के रूप में ऊर्जा प्रदान करती हैं।
यही समन्वय भारत के पारिवारिक और राष्ट्रीय चरित्र की आत्मा है —
जहां रक्षा शस्त्र से नहीं, बल्कि स्नेह और आस्था से होती है।
इतिहास में देखें तो छत्रपति शिवाजी महाराज, रानी लक्ष्मीबाई, और महाराणा प्रताप जैसे योद्धाओं ने भी अपनी माताओं और बहनों के आशीर्वाद को ‘आध्यात्मिक कवच’ माना था।
यही कारण है कि भाई दूज केवल एक पारिवारिक रस्म नहीं, बल्कि भारतीय समाज की सामरिक एकता और मानसिक दृढ़ता का प्रतीक बन गया।
भाई दूज का आध्यात्मिक सार यह सिखाता है कि प्रेम में ही सुरक्षा है और सुरक्षा में ही शक्ति।
जब बहन अपने भाई के माथे पर तिलक लगाती है, तो वह केवल प्रेम का नहीं, बल्कि ऊर्जा, प्रार्थना और रक्षा के मंत्र का संस्कार करती है।
वह क्षण एक ‘मानसिक यज्ञ’ बन जाता है, जिसमें रक्षा का संकल्प और आशीर्वाद का आह्वान एक हो जाते हैं।
योग और अध्यात्म के दृष्टिकोण से देखें तो यह पर्व सूर्य-चंद्र ऊर्जा के संतुलन का प्रतीक भी है —
जहां बहन का प्रेम ‘चंद्र ऊर्जा’ की कोमलता है, और भाई का संरक्षण ‘सौर ऊर्जा’ की दृढ़ता।
दोनों के मिलन से ही जीवन में संतुलन और समरसता आती है।
आज जब संबंधों में व्यावहारिकता और तकनीकी दूरी बढ़ रही है, भाई दूज हमें फिर याद दिलाता है कि
रिश्ते संदेशों से नहीं, स्मरण और संस्कारों से निभाए जाते हैं।
यह पर्व हमें सिखाता है कि सुरक्षा केवल शारीरिक नहीं, भावनात्मक और नैतिक भी होती है।
बहन का तिलक और भाई का आशीर्वाद — दोनों मिलकर परिवार, समाज और राष्ट्र की एकता का अदृश्य सूत्र बनते हैं।
भाई दूज केवल मिठाई और तिलक का पर्व नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति के संरक्षण, समर्पण और संवेदना का जीवंत दस्तावेज है।
यह हमें सिखाता है कि
> “जहां प्रेम है, वहां भय नहीं; जहां आस्था है, वहां दुर्बलता नहीं।”
यही भावना रक्षा बंधन से आगे बढ़कर भाई दूज को “भारतीय सामाजिक सुरक्षा प्रणाली” का आध्यात्मिक रूप बनाती है —
जहां बहन का आशीर्वाद कवच है और भाई का प्रण वचन, शस्त्र।

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