त्वरित टिप्पणी पूर्व में दलित तहसीलदार की सरकारी आवास में हो चुकी पिटाई, पुलिस चौकी पर पीटे जा चुके हैं इंचार्ज प्रोटोकॉल के आगे क्या कन्नौज में सत्ता से बड़ा है सामाजिक पूर्वाग्रह? पिछड़ों और दलितों संग सुगंध की धरती पर पहले भी हुआ अपमान, अब तो मंत्री भी सिमटे =मंत्री के अपमान के पीछे बड़ा राजनैतिक हाथ!
यूथ इंडिया (शरद कटियार)
लखनऊ, कन्नौज। कन्नौज का रोमा स्मारक अब एक कार्यक्रम नही बल्कि सिस्टम की सोंच का एक्स-रे बन चुका है, सबाल सीधा है कि क्या यह महज अव्यवस्था थी या फिर सत्ता के गलियारों में छिपा हुआ कोई पूर्वाग्रह, जो बार बार झलक रहा है ?
असीम अरूण एक ऐसा नाम, जिसने बर्दी में ईमानदारी की मिशाल दी, देश की शीर्ष सुरक्षा में भूमिका निभाई और फिर राजनीति में आकर भी साफ छवि बनाये रखी। उनके पिता श्रीराम अरूण उ त्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक रहे, यानि कद, क्षमता और अनुभव तीनों में कोई कमी नही। फिर भी बार-बार अनदेखी? कन्नौज के डीएम आशुतोष मोहन अग्रिहोत्री पर यह आरोप कोई एक दिन का नही है सवाल उठता है क्या यह केवल कोआर्डिनेशन गैप है या फिर कंसिटेंट बिहैवियर पैटर्न?
जब एक मंत्री को बार-बार प्रोटोकॉल में हाशिए पर रखा जाये, तो यह महज प्रशासनिक चूक नही रह जाती बल्कि संदेश बन जाती है और यहीं से बहस उस असहज मोड पर पहुंचती है जहां वर्ण व्यवस्था और मानसिकता जैसे शब्द सामने आते है। अगर चर्चा यह कहती है कि मंत्री की सामाजिक पृष्ठभूमि को लेकर दूरी बनाई गई तो यह आरोप हल्के नही है। यह सीधे उस संवैधानिक मूल भावना पर चोट है जहां सभी नागरिक और प्रतिनिधि बराबर है।
भूसूर, मानसिकता जैसे शब्द यूं ही हवा में नही उभरते, वह तब जन्म लेते हैं, जब व्यवस्था में बराबरी संदिग्ध लगने लगे। इस पूरे परिद्रश्य में सुब्रत पाठक का नाम भी अंदरखाने बार-बार सामने आता है। स्थानीय राजनीति में उनकी पकड़ और पुराने विवाद दलित पिछडे वर्ग के साथ कथित टकराव, अधिकारियों से विवाद और सामाजिक टिप्पणियां आज भी चर्चा में है।
डीएम आशुतोष मोहन अग्रिहोत्री पहले भी कई बार मंत्री को अनदेखा कर चुके है और कहीं न कहीं उनमें भूसूर की प्रवत्ति भी देखने को मिली है, मंत्री असीम अरूण दलित समुदाय से ताल्लुक रखते है। हांलाकि उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि और हैसियत जिलाधिकारी से कोषों आगे है। उनकी साफ सुथरी छवि के कारण मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ उन्हें नौकरी से इस्तीफा दिलवाकर राजनीति में लाये थे और भाजपा ने उनके गृह जनपद कन्नौज से विधायक बनाया था, और पहली ही बार में असीम अरूण आईपीएस अधिकारी से सीधे राजनीति के दरवाजे से प्रोन्नत होते हुए उत्तर प्रदेश के समाज कल्याण विभाग जैसे महत्वपूर्ण विभाग के स्वतंत्र प्रभार राज्यमंत्री बनाये गये।
इसके बाबजूद वर्ण व्यवस्था को प्राथमिकता देने वाले जिलाधिकारी आशुतोष मोहन अग्रिहोत्री ने सदैव मंत्री का अनादर ही किया। इसके पीछे चर्चा रही कि वह कभी मंत्री को माननीय मानने से खुद से स्वीकार नही हुए। चर्चा तो यहां तक है कि जब भी जिलाधिकारी ने मंत्री को नीचा दिखाने की कोशिश की तब पूर्व सांसद ने अन्दरखाने डीएम का समर्थन ही किया। मंत्री असीम अरूण का कन्नौज की राजनीति में आना सबसे ज्यादा किसे खला यह किसी से छिपा नही रहा। अपने दौर में पूर्व सांसद सुब्रत पाठक कई बार दलितों और पिछडों का उत्पीडन करने में आगे रह चुके हैं।
तत्कालीन तहसीलदार सदर जो दलित जाति से ताल्लुक रखते थे उनके तो सरकारी आवास में घुसकर उनकी डंडों से पिटाई तक की गई थी। रानी अवंतीबाई मूर्ति प्रकरण हो या फिर पूर्व मंत्री सतीश पाल सभी को जातीय शब्दों से कन्नौज में अपमानित किया जा चुका है। कन्नौज के लोधी समाज के लोगों को खुलेआम यह कहा जा चुका है कि तुम्हारा वोट खरीदा था……..
हांलाकि इस बात को लेकर लोधी समाज में नाराजगी की लहर दौड गई थी। जिसके चलते भाजपा का पूरे उत्तर प्रदेश में एक बड़ा वोट नुकसान हुआ था। कन्नौज की पुलिस चौकी में घुसकर दरोगा संग की गई मारपीट और पुलिस का सत्ता के आगे बेवस हो जाना किसी से छिपा नही। और आज उसी व्यवस्था और मानसिकता के शिकार प्रदेश सरकार के काबिल मंत्री भी हो गये।


