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Saturday, January 24, 2026

बसंत सनातन का ऐसा अकेला त्यौहार जिसे मनाते हैं सभी धर्म जाति व मजहबों के लोग

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नगर में इस बार भी देखने को मिला गंगा जमुना तहजीब का नजारा, खूब उड़ी पतंगें

फर्रुखाबाद: एक ओर जहां गंगा-जमुनी तहजीब (Ganga-Jamuni Tehzeeb) को समाज का एक खास वर्ग चोर हरण करने में लगा हुआ है, वहीं दूसरी ओर ज्ञान, बुद्धि और कला की देवी मां सरस्वती के जन्मदिन बसंत पंचमी (Basant Panchami) पर्व पर गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल जनपद में एक बार फिर देखने को मिली। जहां हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सहित सभी धर्मों के लोग बसंत पंचमी पर्व पर पतंगों के माध्यम से देश की एकता के सूत्रधार बने आसमान में म पतंगें खूब लहराई।

बच्चों में डोरेमॉन, मोटू पतलू, छोटा भीम व बाहुबली की पतंगों का खूब क्रेज दिखा। बसन्तोत्सव पर लोगों ने परंपरा मुताबिक पीले वस्त्रों को पहना और पीली तहरी और पूड़ी-कचौड़ी आदि पकवानों को अपनी-अपनी छतों पर खानपान व पतंग उड़ाने के साथ खूब मौज मस्ती की। ‘चली-चली रे पतंग मेरी चली रे, बादलों के पार होकर डोर पे सवार सारी दुनिया यह देख-देख जली रे, चली-चली रे मेरी पतंग चली रहे…’ के आदि गीतों के बीच घर-घर की छतों व मैदानों पर पतंगें ऐसी उड़ी की पूरा आसमान रंगबिरंगी पंतगों के रंगों से नहा गया।

जिले में बसंतोत्सव पर पतंगबाजी से कोई अछुता नहीं रहा। जिलेभर में बले, युवा-युवतियां सहित बुजुर्गों में भी पंतग उड़ाने का जुनून साफ-साफ दिखा। बतातें चलें फर्रुखाबाद जनपद में बसंतोत्सव मनाने का एक खास अंदाज है। इस पर्व को तीन दिन तक पतंगबाजी के साथ जमकर मनाया जाता है। बसंतोत्सव का पहला दिन यानि आज बच्बों का, दूसरा दिन नौजवानों और तीसरा दिन वृद्ध लोगों का कहा जाता है। लेकिन यह सिर्फ कहावत मात्र ही है। हालांकि बच्चे, नौजवान, बूढ़े और युवतियां के दिन खूब उल्लास पूर्वक पतंगबाजी का आनंद लेते हैं।

बता दें कि बसंतोत्सव पर्व न सिर्फ भारत में बल्कि पड़ोसी देशों बांग्लादेश और नेपाल में भी मनाया जाता है। बसंतोत्सव के बारे में ऐसी धार्मिक मान्यता है कि बसंत पंचमी के दिन मां सरस्वती का धरती पर आगमन हुआ था। पौणाणिक कथाओं के अनुसार ब्रहमा जी ने संसार की रचना की। उन्होंने पेड़-पौधे, जीव-जंतु और मनुष्य बनाए, लेकिन उन्हें लगा कि उनकी रचना में कुछ कमी रह गयी। इसलिए ब्रहमा जी ने अपने कमंडल से जल छिड़का, जिससे चार हांथों वाली एक सुंदर स्त्री प्रकट हुई। उस स्त्री के एक हांथ में वीणा, दूसरे में पुस्तक, तीसरे में माला और चौथा हांथ वर मुद्रा में था। ब्रहमा जी ने इस सुंदर देवी से वीणा बजाने को कहा। जैसे ही वीणा बजी ब्रह्मा जी की बनाई हर चीज में स्वर आ गया।

तभी ब्रह्मा जी ने उस देवी को वाणी की देवी सरस्वती नाम दिया। वह दिन बसंत पंचमी का था। इसी वजह से हर वर्ष बसंत पंचमी के दिन देवी सरस्वती का जन्मदिन भी मनाया जाने लगा। इसके साथ ही बसंतोत्सव अकेला ऐसा पर्व है जिसे मुस्लिम वर्ग में भी मनाया जाता है। अमीर खुसरों जोकि सूफी संत थे उनकी रचनाओं में भी बसंत की झलक मिलती है। ऐतिहासिक प्रमाण के अनुसार बसंत को जाम औलिया की बसंत ख्वाजा बख्तियार काकी की बसंत के नाम से जाना जाता है।

वहीं, पतंगबाजी का बसंत से कोई सीधा संबध तो नहीं है। लेकिन पतंग उड़ाने का रिवाज हजारों साल पहले चीन से शुरू हुआ। फिर कोरिया और जपान के रास्ते होता हुआ भारत पहुंचा। इसके बाद फर्रुखाबाद सहित देश के कई शहरों में बसंतोत्सव पर पतंग उड़ाने का प्रचलन हो गया, जो बाद में पतंगों का भी दिन कहा जाने लगा।

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