20.1 C
Lucknow
Wednesday, February 25, 2026

बांग्लादेश के बारिशाल में अदालत परिसर में हंगामा, मानवाधिकार संगठन ने की कड़ी निंदा

Must read

बांग्लादेश के बारिशाल जिले की एक अदालत में अवामी लीग के कई नेताओं को जमानत दिए जाने के बाद कोर्ट परिसर में हंगामे की घटना सामने आई है। जमानत आदेश के तुरंत बाद कुछ वकीलों द्वारा कथित रूप से बदसलूकी और अव्यवस्थित व्यवहार किए जाने की खबर है। इस घटना की पेरिस स्थित अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन ‘जस्टिस मेकर्स बांग्लादेश इन फ्रांस’ (जेएमबीएफ) ने कड़ी आलोचना की है।

संगठन का आरोप है कि विपक्षी दल बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) से जुड़े कुछ वकीलों ने अदालत की कार्यवाही में हस्तक्षेप किया। बताया गया है कि ये वकील जबरन कोर्टरूम में घुस गए और बेंच के साथ धक्का-मुक्की की। घटना मंगलवार को अतिरिक्त मुख्य मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट एस. एम. शरियत उल्लाह की अदालत में हुई।

आरोपों के मुताबिक, वकीलों ने न्यायाधीश के साथ भी कथित तौर पर अभद्र व्यवहार किया। वे उन पर चिल्ला रहे थे और उंगली दिखाकर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे थे। इस पूरे घटनाक्रम को अदालत की गरिमा के खिलाफ बताया जा रहा है। कोर्ट परिसर में मौजूद लोगों के अनुसार कुछ समय के लिए स्थिति तनावपूर्ण हो गई थी।

जेएमबीएफ के संस्थापक अध्यक्ष शाहनूर इस्लाम ने बयान जारी कर कहा कि यह घटना न्यायपालिका की स्वतंत्रता और सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े करती है। उन्होंने कहा कि यदि किसी पक्ष को अदालत के फैसले से असहमति है, तो उसे उच्च न्यायालय में अपील करनी चाहिए, न कि अदालत को संघर्ष का मैदान बनाना चाहिए।

संगठन ने यह भी आरोप लगाया कि बिना वैधानिक प्रक्रिया अपनाए न्यायाधीश पर दबाव बनाने की कोशिश न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रयास है। उन्होंने इसे लोकतंत्र, कानून के शासन और न्यायपालिका की आजादी पर सीधा हमला बताया।

मानवाधिकार संगठन ने इस पूरे मामले की न्यायिक जांच की मांग की है। उनका कहना है कि हाई कोर्ट के एक न्यायाधीश की अगुवाई में एक स्वतंत्र जांच आयोग का गठन किया जाना चाहिए, ताकि घटना की निष्पक्ष जांच हो सके और दोषियों की पहचान की जा सके।

जेएमबीएफ ने स्पष्ट कहा कि कोर्टरूम में गैर-कानूनी तरीके से प्रवेश करना, बेंच के साथ धक्का-मुक्की करना, न्यायाधीश पर उंगली उठाना और न्यायिक कार्यवाही में बाधा डालना स्पष्ट रूप से अदालत की अवमानना है। ऐसे कृत्य दंडनीय अपराध की श्रेणी में आते हैं और इनके खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।

संगठन ने जोर देकर कहा कि न्यायपालिका को किसी भी बाहरी प्रभाव या राजनीतिक दबाव से मुक्त रहकर कार्य करने देना लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियादी शर्त है। यदि अदालतों की गरिमा और स्वतंत्रता सुरक्षित नहीं रहेगी, तो आम नागरिकों का न्याय व्यवस्था पर विश्वास कमजोर पड़ सकता है।

घटना के बाद देश में राजनीतिक और कानूनी हलकों में बहस तेज हो गई है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि न्यायपालिका की प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए त्वरित और पारदर्शी कार्रवाई आवश्यक है, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सके।

Must read

More articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Latest article