आज़ादी 1947 में मिली, पर ‘बाग़ी बलिया’ ने 1942 में ही हिला दी थी हुकूमत
बलिया (उत्तर प्रदेश)। भारत को आधिकारिक स्वतंत्रता 15 अगस्त 1947 को मिली, लेकिन 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के दौरान पूर्वांचल के बलिया ने ऐसी क्रांति की मिसाल पेश की, जिसने अंग्रेजी शासन की नींव हिला दी। इतिहास में इसे ‘बाग़ी बलिया’ के नाम से जाना जाता है।
अगस्त 1942 में जब महात्मा गांधी ने ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ का आह्वान किया, तो पूरे देश में जनाक्रोश भड़क उठा। बलिया में यह आंदोलन और भी उग्र रूप में सामने आया। यहां के क्रांतिकारियों और आम नागरिकों ने अंग्रेजी प्रशासन के खिलाफ खुलकर मोर्चा खोल दिया।
समानांतर सरकार की स्थापना
बलिया में आंदोलन का नेतृत्व चित्तू पांडेय ने किया। स्थानीय जनता के समर्थन से अंग्रेज अधिकारियों को जिले से बाहर जाने पर मजबूर होना पड़ा और कुछ समय के लिए यहां समानांतर राष्ट्रीय सरकार की स्थापना कर दी गई। बताया जाता है कि 19 अगस्त 1942 को बलिया लगभग अंग्रेजी नियंत्रण से मुक्त हो गया था।
हालांकि यह स्वतंत्र शासन कुछ ही दिनों तक चल सका, क्योंकि बाद में ब्रिटिश फौज ने कड़ा दमन चक्र चलाया। कई क्रांतिकारियों को गिरफ्तार किया गया, गोलियां चलाई गईं और व्यापक दमन हुआ।
नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा
बलिया के स्वतंत्रता सेनानियों की यह वीर गाथा आज भी देश की नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा स्रोत है। इतिहासकार मानते हैं कि 1942 का यह विद्रोह अंग्रेजी शासन के खिलाफ जनशक्ति की ताकत का बड़ा उदाहरण था।
अक्सर यह तथ्य आम लोगों की जानकारी में नहीं होता कि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान बलिया ने अंग्रेजों को प्रशासनिक रूप से पीछे हटने पर मजबूर कर दिया था। यही कारण है कि बलिया को ‘बाग़ी बलिया’ कहा जाता है।
आज भी बलिया में शहीद स्मारक और स्वतंत्रता सेनानियों की यादें उस संघर्ष की गवाही देती हैं। यह केवल एक जिले की कहानी नहीं, बल्कि उस जनआंदोलन की मिसाल है जिसने 1947 की आज़ादी की नींव मजबूत की।
बलिया की यह गाथा याद दिलाती है कि स्वतंत्रता केवल एक तिथि नहीं, बल्कि अनगिनत बलिदानों और जनआक्रोश का परिणाम है।





