– प्रभात यादव
शिक्षा किसी भी समाज और युवा पीढ़ी की रीढ़ मानी जाती है। यही शिक्षा व्यक्ति को न केवल रोज़गार के योग्य बनाती है, बल्कि उसे सोचने, समझने और समाज के प्रति जिम्मेदार नागरिक बनने की दिशा भी देती है। लेकिन आज भारत की शिक्षा व्यवस्था स्वयं सवालों के घेरे में खड़ी दिखाई देती है, और इसका सीधा असर युवाओं के भविष्य पर पड़ रहा है।
आज की सबसे बड़ी समस्या यह है कि शिक्षा और रोज़गार के बीच तालमेल कमजोर पड़ गया है। कॉलेज और विश्वविद्यालयों में पढ़ाए जा रहे कई पाठ्यक्रम व्यावहारिक ज़रूरतों से कटे हुए हैं। युवा डिग्री तो हासिल कर लेते हैं, लेकिन जब नौकरी की बारी आती है, तो उन्हें बताया जाता है कि उनके पास “ज़रूरी स्किल्स” नहीं हैं।
इस असंगति ने युवाओं को भ्रमित कर दिया है—वे यह तय ही नहीं कर पा रहे कि किस विषय को पढ़ना भविष्य के लिए सही होगा।
कोरोना काल के बाद डिजिटल शिक्षा ने शिक्षा व्यवस्था का चेहरा बदल दिया।
ऑनलाइन क्लास, डिजिटल कोर्स, और ई-लर्निंग प्लेटफॉर्म ने सीखने के नए रास्ते खोले। लेकिन इसके साथ ही डिजिटल असमानता भी बढ़ी।
ग्रामीण क्षेत्रों और गरीब परिवारों के युवा आज भी स्मार्टफोन, लैपटॉप, और स्थिर इंटरनेट जैसे बुनियादी संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं। जहां शहरी छात्र ऑनलाइन कोर्स और ग्लोबल कंटेंट तक पहुंच बना रहे हैं, वहीं ग्रामीण और वंचित वर्ग के युवा पीछे छूटते जा रहे हैं।
परीक्षा-केंद्रित व्यवस्था का दबाव हमारी शिक्षा व्यवस्था आज भी अंकों और परीक्षाओं के इर्द-गिर्द घूमती है।
रटने की संस्कृति, कोचिंग पर निर्भरता, और प्रतिस्पर्धा का अत्यधिक दबाव ने शिक्षा को बोझ बना दिया है।

इसका परिणाम यह है कि छात्र सीखने की बजाय केवल परीक्षा पास करने पर केंद्रित हो गए हैं। रचनात्मकता, आलोचनात्मक सोच और समस्या-समाधान जैसी क्षमताएँ पीछे छूटती जा रही हैं।
ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि से आने वाले युवाओं के लिए हालात और कठिन हैं।स्कूलों में शिक्षकों की कमी, बुनियादी ढांचे का अभाव, और मार्गदर्शन की कमी उनके सपनों के रास्ते में बाधा बनती है।ऐसे युवा अक्सर मेहनत के बावजूद समान अवसर नहीं पा पाते, जिससे शिक्षा सामाजिक समानता का माध्यम बनने की बजाय असमानता को और गहरा कर देती है।
आज जरूरत है ऐसी शिक्षा व्यवस्था की जो केवल परीक्षा पास कराने तक सीमित न रहे,बल्कि सोचने, सवाल करने और समाधान खोजने की क्षमता विकसित करे,जो युवाओं को नौकरी खोजने वाला ही नहीं, बल्कि नौकरी देने वाला भी बनाए,और जो शिक्षा को जीवन और समाज से जोड़ सके।
यदि शिक्षा व्यवस्था में समय रहते सुधार नहीं किया गया, तो यह युवा पीढ़ी के लिए अवसर की जगह बोझ बन सकती है।शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री देना नहीं, बल्कि सक्षम, आत्मनिर्भर और जागरूक नागरिक तैयार करना होना चाहिए।यही वह रास्ता है, जिससे युवा न केवल अपना भविष्य संवार सकें, बल्कि देश के भविष्य को भी दिशा दे सकें।

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