
संदीप सक्सेना”
अहसान फरामोश हो रही दुनिया, अब किससे फ़रियाद करे,
अपने हो रहे पराये, अब किससे कोई आश करेज्”
ये सिफऱ् पंक्तियाँ नहीं हैं, बल्कि आज के समाज का कड़वा सच हैं। यह सच उस दौर का आईना है जहाँ रिश्ते, संवेदनाएँ और इंसानियत धीरे-धीरे स्वार्थ की धुंध में खोती जा रही हैं। कभी जिन हाथों ने सहारा दिया, आज वही हाथ मदद माँगने पर खाली लौट जाते हैं। आज की दुनिया तेज़ है, चमकदार है, आधुनिक है— लेकिन सवाल यह है कि क्या यह संवेदनशील भी है?
अहसान का अर्थ केवल आर्थिक मदद नहीं होता। किसी का दुख बाँटना, किसी को भावनात्मक सहारा देना, किसी के संघर्ष में साथ खड़े होना भी अहसान ही होता है। लेकिन आज का समय “थैंक यू” तक सीमित होकर रह गया है—और वो भी तब, जब सामने वाला हमारे किसी काम का हो।
जिन लोगों ने जीवन की कठिन राह में कदम-कदम पर हमारा साथ दिया, समय बदलते ही वे यादों के कोने में डाल दिए जाते हैं। आज की दुनिया ज़रूरत से रिश्ते बनाती है और ज़रूरत खत्म होते ही उन्हें तोड़ देती है।
सबसे पीड़ा तब होती है जब उम्मीद अपनों से हो और वही भरोसा तोड़ दें। दोस्त, रिश्तेदार, यहां तक कि कभी-कभी परिवार भी परिस्थितियों के बदलते ही अपना रंग बदल लेता है। जो कल तक हमारी हँसी का हिस्सा थे, आज हमारी परेशानी से दूरी बना लेते हैं।
यह वही दौर है जहाँ लोग हमारे साथ सेल्फी तो लेना चाहते हैं, लेकिन हमारे साथ संघर्ष नहीं। लोग हमारी कामयाबी के जश्न में शामिल तो होना चाहते हैं, लेकिन हमारी असफलता के आँसू पोंछने कोई नहीं आता।
जब अपने ही पराये हो जाएँ, तो इंसान किससे फ़रियाद करे? समाज से? सिस्टम से? या फिर खुद से?
आज हर व्यक्ति भीतर ही भीतर टूट रहा है, लेकिन बाहर से मुस्कान ओढ़े हुए है। सोशल मीडिया पर हँसी के फिल्टर हैं, लेकिन असली जि़न्दगी में आँसू बिना गवाह के बह जाते हैं।
हर कोई व्यस्त है—अपने करियर में, अपने स्वार्थ में, अपनी दुनिया में। किसी के पास दूसरों के दुख सुनने का समय नहीं है। ऐसे में इंसान का अकेलापन और पीड़ा और भी गहरी हो जाती है।
उम्मीद वही आखिरी धागा होती है जो इंसान को टूटने से बचाए रखती है। लेकिन जब बार-बार धोखा मिले, जब बार-बार भरोसा टूटे, तो वही उम्मीद भी कमजोर पड़ जाती है। तब इंसान खुद से सवाल करने लगता है—
क्या मेरी गलती थी किसी पर भरोसा करना?
क्या इस दुनिया में सच्चाई और रिश्तों की अब कोई जगह नहीं बची?
हम एक ऐसे समाज की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ इंसान की कीमत उसके फायदे से आँकी जा रही है। जहाँ संवेदना को कमजोरी समझा जाता है। जहाँ त्याग करने वाले को मूर्ख और स्वार्थ करने वाले को चतुर कहा जाता है। बुज़ुर्ग अकेले, युवा तनाव में, बच्चे मोबाइल में कैद—यह है आज की तस्वीर। रिश्ते हैं, लेकिन अपनापन कम है। भीड़ है, लेकिन साथ कोई नहीं।
हालाँकि सब कुछ खत्म नहीं हुआ है। आज भी इस दुनिया में कुछ ऐसे लोग हैं जो बिना किसी स्वार्थ के मदद करते हैं। जो दर्द देखकर आँखें नहीं फेरते। जो रिश्तों की कीमत समझते हैं। वही लोग इस दुनिया को अब भी जीने लायक बनाए हुए हैं।
जरूरत है कि हम फिर से अहसान की कीमत समझें, रिश्तों की अहमियत पहचानें और अपनेपन को जि़ंदा रखें। हमें यह याद रखना होगा कि आज अगर हम किसी के लिए सहारा बनें, तो कल वही हमारे लिए उम्मीद बन सकता है।
अहसान फरामोश हो रही दुनिया केवल एक शिकायत नहीं, बल्कि एक चेतावनी है। अगर हमने आज अपने व्यवहार को नहीं बदला, तो कल हम भी वही सवाल दोहराने को मजबूर होंगे अब किससे फ़रियाद करें, किससे कोई आश करें?
आइए, हम इस बदलती हुई दुनिया में कम से कम एक ऐसा इंसान ज़रूर बनें, जो किसी के भरोसे को टूटने न दे, किसी के अहसान को भूले नहीं और किसी के अपने को पराया न बनाए।
(लेखक यूथ दंडिया न्यूज ग्रुप के उप संपादक है)


