– सर्वश्रेष्ठ सांसद से ‘क्षत्रिय धर्म’ तक की सियासत
यूथ इंडिया
सोलहवीं लोकसभा में देश के पांच सर्वश्रेष्ठ सांसदों में शामिल रहे कुंवर हरिवंश सिंह को वह सम्मान मिला, जो संसद में विकास, योजनाओं और जनहित के कामकाज का प्रमाण था। वर्ष 2019 में इंडिया टुडे ग्रुप द्वारा मिला यह अवॉर्ड केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि प्रतापगढ़ मॉडल ऑफ डेवलपमेंट की मुहर था।
विडंबना यह रही कि क्षत्रिय धर्म और स्वाभिमान पर अडिग रहने की राजनीतिक कीमत उन्हें टिकट कटने के रूप में चुकानी पड़ी। आज़ादी के बाद प्रतापगढ़ में जितना इन्फ्रास्ट्रक्चर, योजनागत विकास और केंद्रीय संसाधनों का प्रवाह कुंवर हरिवंश सिंह के कार्यकाल में हुआ, वैसा उदाहरण विरले ही मिलता है।
क्षत्रिय एकजुटता और सनातन चेतना के पुनर्जागरण के लिए मिशन क्षत्रिय एकता – 2026 का रोडमैप राघवेंद्र सिंह राजू द्वारा तैयार किया जा रहा है। नारा स्पष्ट है—
“ठाकुरों में है दम, बदलाव मिलकर लाएंगे हम।”
“वक्त को जिसने न समझा, वह बड़ा नादान है क्षत्रियों।
रियासतें लेकर हमसे सियासत—
अखंड भारत निर्माण के लिए दी थीं रियासतें।”
इतिहास गवाही देता है कि राजपूत काल भारत की आर्थिक, सांस्कृतिक और सैन्य शक्ति का स्वर्णिम युग था। उस दौर में भारत का वैश्विक जीडीपी में योगदान लगभग 25% आंका जाता है।
आज यह आंकड़ा 3.37% के आसपास है—यह गिरावट केवल आर्थिक नहीं, नीतिगत और वैचारिक भी है।
आर्थिक ताकत – व्यापार, कारीगरी, मसाले, कपास और आभूषणों में वैश्विक पहचान।
संस्कृति और कला – किले, मंदिर, स्थापत्य, संगीत और शिल्पकला की अमिट विरासत।
सैन्य शौर्य – साहस, निष्ठा और युद्धकला जिसने भारत की सीमाओं और अस्मिता की रक्षा की।
बलिदान की अनसुनी गाथा
जहां आज एक गज जमीन देना भी कठिन हो, वहां 565 रियासतें, 43 गढ़, 18,700 किले और लगभग 40 लाख एकड़ भूमि राष्ट्र निर्माण के लिए समर्पित करने वाला समाज—राजपूत समाज—अपने बलिदान और संघर्ष के लिए इतिहास में अमर है। यह त्याग किसी जातीय श्रेष्ठता का दावा नहीं, बल्कि राष्ट्र के लिए दी गई आहुति का स्मरण है।
छवि-निर्माण से छवि-भ्रम तक
समय के साथ राजपूत समाज को लेकर नकारात्मक धारणाएं और राजनीतिक प्रोपेगेंडा गढ़ा गया। परिणामस्वरूप समाज को पहचान, प्रतिनिधित्व और अवसरों की चुनौतियों का सामना करना पड़ा। यह मुद्दा किसी एक समाज का नहीं—राष्ट्रीय विमर्श की गुणवत्ता का है।
आज आवश्यकता है कि हम स्वाभिमान, कर्तव्य और राष्ट्रधर्म के मूल्यों को पुनर्जीवित करें—विभाजन नहीं, सशक्तिकरण के साथ। अतीत से प्रेरणा लेकर वर्तमान की नीति और भविष्य की दिशा तय की जाए।
स्पष्ट अस्वीकरण: यह लेख किसी जाति या समाज के विरुद्ध नहीं है। उद्देश्य केवल यह रेखांकित करना है कि राजनीतिक स्वार्थ के लिए राजपूत समाज को अनावश्यक रूप से बदनाम किया गया, जबकि इतिहास गवाह है कि उन्होंने राज्य और समाज के लिए अपने प्राणों तक की बाजी लगाई।
इसी क्रम में सुखवीर सिंह भदोरिया ने घोषणा की कि 22 मार्च को गोरखपुर में पूर्वांचल प्रदेश अधिवेशन आयोजित होगा।
कार्यक्रम से जुड़े संगठनात्मक दायित्वों में पारस चौहान, राहुल, और आईटी सेल उत्तर प्रदेश की भूमिका अहम बताई जा रही है।
इतिहास केवल याद करने के लिए नहीं—दिशा तय करने के लिए होता है। कुंवर हरिवंश सिंह का प्रकरण और राजपूत समाज की गाथा यही कहती है कि स्वाभिमान, विकास और राष्ट्रहित साथ चलें—तो राजनीति भी सार्थक होती है और समाज भी सशक्त।






